बुंदेलखंड में रक्षाबंधन के दूसरे दिन कलियां पर्व मनाने की परंपरा है। मंगलवार को मनभेद, मतभेद, बैर भाव और दुखी परिवारों का उत्साह बढ़ाने का प्रतीक कजलियां पर्व मनाया गया।
बुंदेलखंड में रक्षाबंधन के दूसरे दिन कजलियां पर्व मनाने की परंपरा
सागर. बुंदेलखंड में रक्षाबंधन के दूसरे दिन कलियां पर्व मनाने की परंपरा है। मंगलवार को मनभेद, मतभेद, बैर भाव और दुखी परिवारों का उत्साह बढ़ाने का प्रतीक कजलियां पर्व मनाया गया। कजलियां पूजन के लिए कई लोग चकराघाट पहुंचे और भगवान को कजलियां अर्पित की। लोगों ने एक-दूसरे को कजलियां भेंट कर सुख-दुख बांटा, जिसके चलते घरों में लोगों का आना जाना लगा रहा। पर्व के चलते महिलाओं ने को कजलियों को सिर पर रखकर कुंओ, तालाब और नदियों में विसर्जन किया। कुछ कजलियों को धोकर श्रद्घालु घर लाए और अपने रिश्तेदारों व मित्रों के घर पहुंचकर एक-दूसरे को देकर सुख-दुख बांटने का संकल्प लिया। सुबह से लेकर शाम तक कजलिया विसर्जन का सिलसिला चलता रहा, जिसके चलते चकराघाट परिसर में मेले जैसा माहौल रहा। चकराघाट स्थित शीतला माता मंदिर व आसपास के मंदिरों में भगवान को कजलिया अर्पित करने के बाद श्रद्धालुओं ने घरों में पहुंचकर एक-दूसरे को कजलिया भेंटकर आशीर्वाद लिया।
बैर-भाव मिटाने का पर्व है
पं. केशव महाराज ने बताया कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की नवमीं को कजलियां बोई जाती हैं। यह कजलियां हरियाली और सुख-समृद्घि का प्रतीक होती है। त्योहार के बाद इन कजलियों की खुंटाई होती है। समाज के बुजुर्ग, युवा, महिलाएं आपस में कजलियों की अदला-बदली करते हैं। जिसका मतलब होता है कि यह हरियाली कभी हमारे पास थी तो कभी तुम्हारे पास भी जा सकती है। दोनों ही परिस्थितियों में हम साथ रहेंगे।