
MP News : आप अगर निश्चिंत होकर बस में सफर करना चाहते हैं तो उसके लिए बड़ी कीमत चुकाते हैं। बावजूद इसके सफर में लेटलतीफी, जोखिम और बदमिजाजी ही मिले तो यात्रा का कष्ट भुलाए नहीं भूला जाता। नेशनल परमिट के नाम पर दौड़ती बसों में सुकूनभरा सफर अमूमन मुश्किलों भरा ही होता है। पिछली कुछ बस यात्राओं के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि, लग्जरी के नाम पर लूट मची है। इसमें अच्छी रेटिंग का खेल रचकर मनमाना किराया वसूलना भी शामिल है।
नेशनल परमिट और निजी बसों की ऑनलाइन बुकिंग के दो प्लेटफॉर्म हैं। इनमें समय और किराए के साथ बस का ब्यौरा होता है। इस ब्यौरे में बहुत कुछ गलत होता है, जैसे वाय-फाय, पानी की बोतल, कंबल इत्यादि सिर्फ छलावा है। सबसे बड़ी हैरानी बस किराए की है, यहां डायनामिक चार्ज वसूल किया जाता है। एक ही बस का किराया अलग-अलग तारीखों में 799 रुपए से लेकर 2999 रुपए तक दिखा रहा था। सीट भरती जाती है और किराया बढ़ता जाता है। त्योहार, विशेष अवसरों पर किराया मुसाफिर की जेब काट लेता है। हैरानी इस बात की है कि, परिवहन विभाग बेसुध पड़ा रहता है। खैर, एक सीट की बुकिंग करा ली।
परिवहन अधिकारी कार्यालय के पास सागर में करोड़ों का एक बस स्टैंड ढांचा बनकर रह गया है। प्रोजेक्ट के बारे में किसी भी जानने वाले से पूछो तो वह बताता है कि यहां बसें नहीं जातीं, बल्कि नेताओं की जमीन की कीमत बढ़वाने के लिए इसे बनवाया गया है। सरकारी रेकॉर्ड में आसपास नेताओं की जमीन होना प्रमाणित है। इसे छोड़कर बस की बात करते हैं तो बस भोपाल से सागर और ग्वालियर होते हुए दिल्ली तक जाती थी। लेकिन, यह लेहदरा बस स्टैंड पर भी नहीं रुकती और पुराने बस स्टैंड पर भी नहीं जाती। सीधे बस सर्विस के संजय ड्राइव के सुनसान रोड पर पार्सल ऑफिस में आती है। यात्रियों को यहीं बुलाया जाता है। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक हों या परिवहन अधिकारी उनके पास अपने सरकारी वाहन हैं और उसमें बेहिसाब ईंधन इसलिए आम यात्रियों की चिंता उनको नहीं सताती। दिखावे के लिए कभी-कभार कार्रवाई की जाती है।
बुकिंग के दौरान बस की रवानगी का समय रात तकरीबन साढ़े ग्यारह बजे का था, लेकिन भोपाल से सागर आने में विलंब हो गया। बताया गया कि, एक घंटे देरी से आएगी। साढ़े बारह बजे बस आ गई। देरी से आने की बात पर बस चालक चिढ़ गया। राजधानी की सड़कों पर जाम, डीजल भरवाने और खराब राष्ट्रीय राजमार्ग को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद चालक और बस कंपनी के कर्मचारी के बीच बहस और बातचीत में आधा घंटे से ज्यादा का वक्त निकल गया। यात्री अपनी सीट पर इनका विवाद सुलझने की प्रतीक्षा करते रहे। इस बीच टोकने पर एक-दो मिनट की बात कहकर टाल-मटोल चलती रही। स्पष्ट था कि, पांच मिनट में रवानगी झूठ था। यात्री उनके फरेब में फंस चुके थे, बचाने के लिए संभागायुक्त तो आते नहीं जो बसों को परमिट जारी करने पर अंतिम निर्णय लेते हैं।
बस सर्विस के स्टाफ ने इतना तो बता दिया था कि, चालक इस रूट पर नया है। उसका यह दूसरा फेरा है, इसलिए सिर्फ गूगल लोकेशन के आधार पर ऑफिस ही आ पाता है। उसकी बात पर यकीन करते हुए बस में सवार हुए। जैसे ही सागर से बस रवाना हुई, उसकी अंधी रफ्तार ने खलबली मचा दी। चालक ने कहा, वो टाइम कवर कर लेगा, वैसे भी मथुरा के पास जाम में फंसना ही है, इसलिए दिल्ली के समय का दावा नहीं करता। 100 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार को वो कम मान रहा था औैर उससे तेज गति से बस को चला रहा था। इस बीच सहायक चालक ने बस की स्टियरिंग संभाल ली, लेकिन उसने मुख्य चालक की तरह रफ्तार का सिलसिला बनाए रखा। इससे इतना तो मालूम चल गया कि, अभी नेशनल हाइवे पर रफ्तार पर नियंत्रण लगाने ट्रैकर नहीं है और बसों का कोई चालान भी नहीं बनता।
बस की रफ्तार तेज थी, इसलिए 200 किलोमीटर का सफर 3 घंटे से कम समय में पूरा हो गया। बस झांसी निकल चुकी थी। जिन यात्रियों को झांसी उतरना था, वो बस के केबिन में पहुंच गए। बार-बार सहायक चालक से झांसी में रोकने को कहते रहे और वो पहले तो कहने लगा, अभी चुपचाप बैठो, आगे आएगा तो उतार देंगे। यात्री ने कहा, गूगल मैप के अनुसार झांसी निकल चुका है। लेकिन वो चालक खुद पर भरोसा करता था, न कि गूगल मैप पर। इस बीच हड़बड़ी में अधिकांश यात्री उठ गए। मुख्य चालक को उठाया गया। गूगल मैप पर देखकर यात्री ने कहा, यह रूट गलत है, आप ग्वालियर-दिल्ली के बजाय शिवपुरी जाने वाले मार्ग पर हो। तब तक बस झांसी से करीब 26 किलोमीटर आगे निकल चुकी थी। बस रोकी गई और फिर यूटर्न लेकर वापस झांसी की तरफ चले। इस गड़बड़ी ने इतना तो साफ कर दिया कि बस स्टाफ पर कोई नियंत्रण नहीं है, वह भी तब जब इसी कंपनी की बस के चालक ने आग लगने पर बस रोकने के बजाय यात्रियों से कहा था, मरते हो तो मर जाओ, बस नहीं रुकेगी।
गलत मार्ग पर जाने और वहां से वापसी में बस ने 50 किलोमीटर से अधिक का सफर किया। माइलेज और टोल प्लाजा का शुल्क मिलाया जाए तो बस कंपनी का नुकसान साफ नजर आता है। लेकिन बसों में कमाई इतनी है कि, उनको फर्क नहीं पड़ता। अगर नुकसान से फर्क पड़ता तो बस स्टाफ पर एक्शन तय था, लेकिन उनका बर्ताव बता रहा था कि, कुछ नहीं होने वाला। वैसे भी जीपीएस से बसों के रूट की निगरानी नहीं होती। यात्रियों की परेशानी भी फीडबैक तक सिमट जाती है। बस की रेटिंग तब भी अच्छी ही दिखती है। इसे छोड़कर सफर आगे बढ़ाते हैं। यात्रियों की नींद उड़ चुकी थी। बस वापस झांसी पहुंची, यहां पांच मिनट का स्टापेज दिया गया। चाय-पानी और निवृत्ति के लिए यात्री उतरे। हालांकि, बस में टॉयलेट की सुविधा थी। यहां भी बस आधा घंटे रुकी रही।
बस जितनी देर खड़ी रही, उसका चालक खजियाता रहा। कभी कंपनी को गरियाता और कभी हालात को। उसने बताया कि, अधिकांश बसें राज्य विशेष से चालक चलाते हैं। वो सूखा नशा करते हैं, इसलिए उनको पकड़ना नामुमकिन होता है। नींद भगाने के लिए ऐसा करते हैं और लगातार दो-दो दिन बस चलाते हैं। काला नशा तो ज्यादातर करते हैं। उसने सूखे और काले नशे को भी समझाया। फिर खुद को भिंड का बताते हुए कहा, हमारा तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, चाहे कोई कहीं का मुखिया (यहां जो पद औैर नाम उसने लिए उनको लिखना ठीक नहीं है) हो। झांसी से फिर स्टियरिंग मुख्य चालक ने संभाली। 100 किलोमीटर का सफर एक घंटे में पूरा करते हुए सुबह 6 बजे से पहले ग्वालियर पहुंच गए। बुकिंग के हिसाब से पड़ाव पर मुझे उतरना था, लेकिन उसने कहा, बस वहां नहीं जाएगी। नाका चंद्रबदनी से आगे विवेकानंद चौराहे पर उतारा। यात्रियों द्वारा गलतियों का अहसास कराने और उसकी हरकतों पर डांटने के बाद भी उसे फर्क नहीं पड़ा।
इस पूरी यात्रा में सबसे अहम सवाल यह है कि, परिवहन विभाग के नियम कमजोर हैं या परिवहन अधिकारी किसी फायदे या प्रभाव में कमजोर पड़ जाते हैं। डायनामिक चार्ज की वसूली ऑनलाइन बुकिंग में साफ दिख रही है। हादसे और मौतें भी फिटनेस और बेलगाम गति पर अंकुश नहीं लगा सके हैं। नेशनल परमिट के नियमों का उल्लंघन करते हुए बस कंपनियां एक ही जगह एक ही समय पर एक-एक यात्री का टिकट काटकर सफर करा रही हैं, लेकिन इनपर कार्रवाई में हाथ कांपते हैं। बसों को ट्रक बना दिया है, दिल्ली, मुंबई और प्रदेश में इंदौर, ग्वालियर से अन्य शहरों में माल-पार्सल ढोए जा रहे हैं, लेकिन किसी को नजर नहीं आ रहा है। यह हालात उस वक्त हैं जब राज्य सरकार ने प्रदेश के यात्रियों की सुविधा के लिए सुगम परिवहन बस सेवा शुरू कर दी है। फिलहाल यह सेवा प्रथम चरण में है, लेकिन आगे इसका विस्तार होगा। इस बीच उन निरंकुश निजी बसों में नियमों की कसावट अनिवार्य है।