अनोखी है इनकी डिक्शनरी, यहां जानिए रामरस,पाताल लौंग का रहस्य…

मध्यप्रदेश साधु-संतों की आवभगत के लिए तैयार है। प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर मौजूद साधु संत भी इसकी तैयारी में हैं।

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Oct 28, 2015
sinhastha
सतना। सिंहस्थ महाकुंभ में सिर्फ छह माह बचे हैं। मध्यप्रदेश साधु-संतों की आवभगत के लिए तैयार है। प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर मौजूद साधु संत भी इसकी तैयारी में हैं। ये सभी सिंहस्थ के आकर्षण का केंद्र होंगे। इनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की जिज्ञासा सबके मन में होती है। फौरी तौर पर देखने में भले ही भिन्नता नजर न आए, लेकिन गौर से देखने पर तो इनके कई रूप मिलेंगे। अखाड़ों का हर क्रियाकलाप परम्पराओं पर आधारित है, वहीं इनके साधु-संतों के नाम, पहनावा, शृंगार आदि के पीछे कारण निर्धारित हैं। आज हम आपको इनका बोलचाल व गोपनीय शब्दों के बारे में रोचक जानकारी दे रहे हैं-
कोई साधु-संत यदि आपसे लंका देने का कहे तो इसे रावण की लंका समझकर चौंक मत जाइए। यहां लंका का मतलब मिर्ची से है। दरअसल भोजन सामग्रियों को लेकर अखाड़ों का अपना अलग ही शब्दकोष है। वैष्णव संप्रदाय में मिर्ची को लंका कहा जाता है। यही नहीं नमक रामरस, प्याज रामलड्डू, लहसून पाताल लौंग, हल्दी रंग बदल और खीर तसमयी जैसे नामों से जानी जाती है। अखाड़ों में काटना शब्द का भी उपयोग नहीं होता। इसके लिए अमनिया शब्द काम में लाया जाता है। मसलन सब्जी काटने की जगह सब्जी अमनिया करना कहा जाएगा। बरतन धोने के लिए भी बरतन अमनिया करना कहा जाता है।
साधु संतों में नाम के पीछे कोई गिरी लगाता है, कोई पुरी, कोई सरस्वती, कोई दास तो कोई शरण। हर अखाड़े का एक उद्देश्य है, धर्म की रक्षा। बावजूद इनके सबके अपने नियम हैं और अपना संविधान भी। समय और परिस्थितियों के साथ अखाड़ों की संख्या जरूर बढ़ी लेकिन परंपरा और उद्देश्य आज भी वही है।
Published on:
28 Oct 2015 12:44 pm
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