वैज्ञानिकों ने गुरुत्व तरंगों (Graviational waves) की मदद से एक रहस्यमय पिंड खोजा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह का पिंड या तो ब्लैकहोल (Black Hole) हो सकता है या फिर न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star)
नई दिल्ली। बचपन से लेकर आज तक हम विज्ञान, पृथ्वी, आकाश, चांद, सूरज और दूसरे तारों के बारे में यही क़िस्से सुनते रहे हैं। विज्ञान (science) के मुताबिक हमारी पृथ्वी सौरमंडल (Solar System) की सदस्य है। हमारा सौरमंडल, हमारे ब्रह्मांड का एक मामूली सा हिस्सा है। ये ब्रह्मांड, पृथ्वी से दिखने वाली आकाशगंगा (Milky Way) का एक हिस्सा है। वैसे समय के साथ हमनें ब्रह्माण्ड (Universe) के बारे में बहुत कुछ जाना है लेकिन अब भी बहुत सी ऐसी बाते हैं जिनसे हम अंजान है।
हमारे वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक उपकरणों से ब्रह्माण्ड की कई प्रक्रियाओं का अवलोकन किया है और हमें ब्रह्माण्ड (Universe) में चल रही गतिविधियों के बारे में बताया है। वैज्ञानिकों को हाल ही में एक पिंड खोज की है। लेकिन अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि ये पिंड ब्लैकहोल (Black Hole) है या फिर न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star)।
वैज्ञानिकों के मुताबिक ये अबतक का सबसे बड़ा न्यूट्रॉन तारा (Neutron star) हो सकता है। लेकिन यह तारा नहीं है तो ये अब तक का देखा गया सबसे छोटा ब्लैकहोल (Black Hole) हो सकता है ।
इटली के यूरोपियन ग्रैविटेशनल ऑबजर्वेटरी ( European Gravitational Observatory) के आधुनिक वर्गो डिटेक्टर और अमेरिका की दो वेव ऑबजर्वेटरी ने इस पिंड को एक गुरुत्व तरंग सेंसर(gravitational waves)के जरिए पकड़ा गया है जो पृथ्वी से 800 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। बताया जा रहा है कि यह हमारे सूर्य से 2.6 गुना ज्यादा भारी है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि ये ब्रह्माण्ड की उन ‘मैस गैप’ पिंडों की श्रेणी में आता है जिनका भार 2.6 से 5 सौर भार (Solar mass) के बराबर होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पिंड तब बना होगा जब कोई अज्ञात पिंड का एक बड़े ब्लैकहोल से 8 करोड़ साल पहले विलय हुआ होगा।ऐसा होते समय वहां से बड़ी मात्रा में गुरुत्व तरंगें निकली होंगी जो पृथ्वी पर पकड़ी गई हैं।
कैसे बनते हैं न्यूट्रॉन तारे और ब्लैकहोल?
वैज्ञानिकों के मुताबिक जब बहुत बड़े और भारी तारों का ईंधन जल जाता है और उनमें विस्फोट होता है तोन्यूट्रॉन तारे और ब्लैकहोल बनते हैं। इस प्रक्रिया को सुपरनोवा कहते हैं।
इसमें जिन तारों का केंद्र हलका होता है वे न्यूट्रॉन तारे बन जाते हैं, लेकिन भारी केंद्र वाले तारे ब्लैकहोल में बदल जाते हैं। जिनमें पदार्थ इतना ज्यादा सघन हो जाता है क इसका गुरुत्व आपसास की गैलेक्सी की धूल और गैस तक को अपने अंदर खींच लेता है।
नॉर्थवेस्टर्सन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और लीगो ऑबजर्वेटरी नेटवर्क में शोधकर्ता विकी कालोगेरा बताते हैं कि इस पिंड के खास गुण की कई तरह से संभावित व्याख्या की जा सकती है। इनमें से सबसे प्रमुख यह है कि यह मूल पिंड काफी छोटा न्यूट्रॉन तारा रहा होगा जिसे अंततः ब्लैकहोल ने पूरा ही निगल लिया होगा।
उन्होंने बताया कि जब दोनों पिंडों में वजन में इतनी बड़ी असमानता हो तो छोटे न्यूट्रॉन तारे की एक ही बार में निगल लिए जाने की संभावना होती है।