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कांच की डिश में तैरते ‘दिमाग’ ने खेला 3D वीडियो गेम, 8 लाख मस्तिष्क कोशिकाओं से अनूठा प्रयोग

वैज्ञानिकों ने बिना शरीर सिलिकॉन चिप पर उगी 8 लाख मस्तिष्क कोशिकाओं से अनूठा प्रयोग किया है। क्या है यह प्रयोग? आइए जानते हैं।

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भारत

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Tanay Mishra

Mar 14, 2026

Human brain cells on chip playing 3d video game

Human brain cells on chip playing 3d video game (Photo - Cortical Labs)

विज्ञान की दुनिया में एक ऐसी हलचल मची है जिसने 'बुद्धिमत्ता' की बुनियादी परिभाषा ही बदल दी है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न की एक लैब में कांच की डिश के भीतर तैर रही 8 लाख जीवित मस्तिष्क कोशिकाएं यानी न्यूरॉन्स न केवल जीवित हैं, बल्कि 'डूम' जैसे जटिल 3डी वीडियो गेम खेल रही हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इन कोशिकाओं के पास न तो कोई शरीर है, न ही कोई पिछला अनुभव, फिर भी ये देख सकती हैं कि गेम के भीतर दुश्मन कहाँ है।

सिलिकॉन चिप पर कोशिकाओं को उगाया

ऑस्ट्रेलिया की कॉर्टिकल लैब्स के वैज्ञानिकों ने इन कोशिकाओं को एक सिलिकॉन चिप पर उगाया और उसे 'डिशब्रेन' नाम दिया। साल 2022 में 'पोंग' खेलने के बाद अब 2026 में इन कोशिकाओं ने डूम पर महारत हासिल कर ली है। जहाँ पोंग में केवल पैडल हिलाना था, वहीं डूम में रास्तों को समझना, दुश्मनों को पहचानना और योजना बनाकर निशाना लगाना शामिल है।

शोर से नफरत ने बनाया 'स्मार्ट'

वैज्ञानिकों ने 'फ्री एनर्जी प्रिंसिपल' का इस्तेमाल किया। जब कोशिकाएं गेम में सही निशाना लगातीं, तो उन्हें 'शांत और व्यवस्थित' इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजे जाते। अगर ये चूक जाती तो 'शोर' वाले सिग्नल मिलते। दिमाग की कोशिकाओं को शोर पसंद नहीं है। इस शोर को रोकने की कोशिश में उन्होंने खुद को बार-बार पुनर्गठित किया, 'स्मार्ट' बनाया और सिर्फ 5 मिनट में गेम की बारीकियाँ सीखनी शुरू कर दीं।

सिलिकॉन चिप्स को मात देती 'बायो-शक्ति'

जहाँ विशाल एआई मॉडल्स को चलाने के लिए बिजली घर चाहिए, वहीं यह बायो-कंप्यूटर मात्र 20 वॉट (एक बल्ब जितनी बिजली) खर्च करता है। साथ ही यह पारंपरिक मशीनी एल्गोरिदम के मुकाबले कहीं ज़्यादा तेज़ी से नई चुनौतियों को अपनाता और सीखता है।

रोबोटिक अंगों में 'जान' फूंकेंगे न्यूरॉन्स

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह प्रयोग सिर्फ गेम तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में ये 'ज़िदा चिप्स' रोबोटिक अंगों को बिल्कुल इंसानी अंदाज में कंट्रोल कर सकेंगी। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि ये न्यूरॉन्स रोबोटिक अंगों में 'जान' फूंकेंगे। साथ ही यह डिमेंशिया और मिर्गी जैसी दिमागी बीमारियों के इलाज को समझने का एक नया जरिया बन सकता है।