
सीहोर। इस कलयुगी दुनिया में कोई किसी का नहीं हैं फिर भले ही वे मां—बाप ही क्यों न हो। कुछ लोग अपने ही खून के साथ ऐसी शर्मनाक हरकतें कर देते है। जिससे किसी भी रिश्ते पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसा ही कुछ मामला सीहोर में भी सामने आया।
अपनी की फूल सी सामान बेटी के साथ ज्यादती करने वाले कलयुगी पिता को अदालत ने 15 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
बाप—बेटी के रिश्ते को किया बदनाम
बाप—बेटी का रिश्ता बहुत ही अनमोल होता है। जहां शब्दों से ज्यादा भावनाएं होती हैं। पर, सीहोर निवासी अवधेश कुमार ने अपनी ही बेटी के साथ ज्यादती कर, इस रिश्ते की गरिमा को ठेस पहुंचाई हैं। जिसके चलते उनके परिवार वाले उनके खिलाफ हो गए।
बेटी मां और दादा ने दिया साथ
बेटी ने दादा और अपनी मां के साथ थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराने का साहस दिखाया था। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश अवधेश कुमार सिंह नसरुल्लागंज ने पिता को अपनी बेटी के साथ ज्यादती का आरोप दोष सिद्ध होने पर यह फैसला सुनाया है। इसके साथ एक हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया है। अर्थदंड नहीं देने की स्थिति में दो माह का अतिरिक्त कारावास भुगतने का आदेश दिया गया है।
यह था मामला
अभियोजन की ओर से विशेष अपर लोक अभियोजक अतिरिक्त जिला अभियोजन अधिकारी देवेन्द्र सिंह ठाकुर के अनुसार 1 अगस्त 2016 की रात को नसरुल्लागंज के ग्राम लाचौर निवासी राकेश पिपलोदी पिता मोतीलाल पिपलोदी ने कक्षा चार में पढऩे वाली 11 वर्षीय बेटी को खाने देने के लिए कहा था।
जब बेटी अपने पिता को खाना देने पहुंची तो कलयुगी पिता ने उसके साथ यह कहकर ज्यादती कि ऐसा नहीं करने पर वह तुम्हारी मां को मार डालेगा। पिता के जबरन करने पर वो भागकर अपने दादा-दादी के पास पहुंची।
विरोध पर हुई हाथापाई
इस दौरान जब माता ने विरोध करने की कोशिश की तो उसके साथ मारपीट की। इस मामले में पीडि़ता 3 अगस्त को दादा और माता के साथ नसरुल्लागंज थाने पहुंची कलयुगी पिता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई।
इस धारा के तहत मिला दंड
द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश अवधेश कुमार सिंह ने मामले में आरोपी पिता राकेश पिपलोदी को भादवि की धारा 376, 2, च का दोषी पाते हुए 15 साल के सश्रम कारावास और एक हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया।
इसके साथ अर्थदंड की राशि नहीं जमा कराए जाने पर दो माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगताने के आदेश दिए गए। न्यायालय ने कहा ऐसी मानसिकता वाले लोगों को कम सजा देना न्यायोचित नहीं होगा।
विकृत मानसिकता के लोग होते हैं ऐसे लोग
शासन द्वारा चिन्हित जघन्य अपराध पर निर्णय सुनाते हुए द्वितीय अपर सत्र अवधेश कुमार सिंह ने लिखा है कि जहां पिता ही पुत्री के साथ ऐसा घृणित यौन अपराध कारित करें तो अन्य व्यक्ति के सरंक्षण में ऐसी अल्प आयु बालिका को सुरक्षित रहने की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है.
ऐसी स्थिति में ऐसे यौन विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति को कम से कम सजा देने से दंडित किया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है।