
सिवनी. जीवन की हर राह में अगर कोई चुपचाप हमारे लिए संघर्ष करता है, तो वो पिता होते हैं। पिता सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों, त्याग और अटूट प्रेम की मिसाल हैं। उनकी मेहनत और समर्पण से ही परिवार की नींव मजबूत होती है। पिता अक्सर अपने भावनाओं को शब्दों में नहीं बयां करते, लेकिन उनका हर प्रयास अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए होता है। वो खुद की इच्छाओं को दबाकर अपने परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता देते हैं। उनकी डांट में छिपा प्यार और उनकी चुप्पी में छिपा संघर्ष ही उन्हें सबसे खास बनाता है। पिता का साया जीवन में हो तो हर मुश्किल आसान लगती है और उनका साथ न हो तो सफलता भी अधूरी सी महसूस होती है। इसलिए जरूरी है कि हम अपने पिता के प्रति सम्मान, प्रेम और कृतज्ञता हमेशा बनाए रखें। पिता ही जीवन की असली ताकत हैं, उनके बिना हर सपना, हर खुशी और हर सफलता अधूरी है। आज फादर्स डे है। इस अवसर पर हमने शहर के बच्चों से पिता के अहमियत को लेकर बात की।
पिता की कमी खलती है, जब थे तो कोई चिंता नहीं थी
किदवई वार्ड निवासी 21 वर्षी आयुष बोरकर के पिता एडवोकेट स्व. गोविंद बोरकर का दो वर्ष पहले 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। आयुष वर्तमान में पीजी कॉलेज में एमकॉम की पढ़ाई, एमपीपीएससी की तैयारी करने के साथ ही काम करके घर का खर्चा भी चलाते हैं। घर पर मां है और उनके ऊपर चाचा के परिवार को भी संभालने की जिम्मेदारी है। आयुष कहते हैं कि जीवन में पिता समझ में आए नहीं, जब आए तो वे हैं नही। वे कहते हैं कि पिता की कमी बहुत खलती है। जब वे थे तब कोई चिंता नहीं थी। घर में एक अलग रौनक थी। पिता का साया जब रहता है तो कुछ सोचना नहीं पड़ता। उन्हीं की सीख है कि आज दो परिवार को संभाल रहा हूं। चाचा का कोविड में देहांत हो गया। उनकी दो बेटियां हैं। दोनों जगह देखना पड़ता है। आयुष कहते हैं कि मेरे जीवन में आई हर मुश्किल को पिता संभाल लेते थे। उनके रहने पर शिक्षा, ज्ञान, प्यार के समुद्र की कभी कमी नहीं हुई। आयुष ने बताया कि कुछ दिन पहले वे कॉलेज में गिर गए थे। खुद ही घर आए। अगर पिता होते तो वह मुझे संभाल लेते। पिता की अहमियत वही जानता है जिसके पिता नहीं होते। उन्होंने कहा कि जिस दिन पिता समझ में आने लगे समझ लें कि उनके जाने की तैयारी हो गई है। आयुष कहते हैं कि अब बस एक ही लक्ष्य है कि जीवन में कुछ ऐसा करूं जिससे पिता का नाम रोशन हो जाए।
हर छोटी-बड़ी बात बिना बोले समझ जाते हैं पिता
राजपूत कॉलोनी निवासी गरिमा सेंगर के जीवन में पिता की बड़ी भूमिका है। कहती हैं कि उनके बिना जीवन संभव ही नहीं है। उन्होंने बताया कि पिता जयदीप सिंग सेंगर पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। ड्यूटी काफी कठिन है। इसके बावजूद भी वे हम दोनों बच्चों को प्रर्याप्त समय देते हैं। कभी किसी बात को लेकर दबाव नहीं बनाया। गरिमा कहती हैं कि पापा हैं तो छांव सी लगती है और सबकुछ अच्छा लगता है। मां-बाप ही हमेशा बच्चों का हित सोचते हैं। पापा आवाज से पहचान जाते हैं कि हम कैसे हैं। परिवार में पिता का स्थान हमेशा से मजबूत स्तंभ की तरह रहा है।मां के साथ पिता की भूमिका परिवार के लिए बहुत अहम होती है। पिता अक्सर अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं करते, लेकिन वे अपने बच्चों की हर छोटी-बड़ी बात बिना बोले ही समझ जाते हैं। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ वे बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी नजर रखते हैं। बच्चे चाहे अपनी परेशानी खुलकर न बताएं, लेकिन पिता उनकी आंखों और व्यवहार से ही हालात भांप लेते हैं। पिता की यह खामोश समझ रिश्तों को और भी मजबूत बनाती है। जब वे किसी परेशानी में होते हैं, तो पिता भले ही ज्यादा सवाल न करें, लेकिन उनका साथ और निर्णय उन्हें सही रास्ता दिखा देता है। पिता का यह गुण परिवार में विश्वास और सुरक्षा की भावना को बढ़ाता है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी पिता का मौन समर्थन बच्चों के लिए सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है।