शहडोल

बड़ी खबर- मध्यप्रदेश में यहां गर्भ में पल रहे बच्चों का नहीं बन पा रहा सिर

बचपन में ही मुड़ जाते हैं पैर, जानिए क्या है कारण ?
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Updated: 24 Feb 2018, 1:35 PM IST
The head of the children born in the womb can not be made

शुभम बघेल@ शहडोल

आदिवासी अंचलों में लचर स्वास्थ्य सुविधाओं के भयावह नतीजे सामने आ रहे हैं। गांवों में लडख़ड़ाई स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की दिशा में भले ही तमाम प्रयास किए जा रहे हों लेकिन मैदानी हकीकत एकदम विपरीत है। गर्भ में बच्चों का सिर ही नहीं बन पा रहा है। दुनिया में कदम रखते ही मासूमों के पैर बचपन से ही मुड़ जाते हैं।

गांवों में ढाई हजार से ज्यादा मासूम अतिकुपोषण का दंश झेल रहे हैं। देखरेख और कमजोर मैदानी स्वास्थ्य अमला की वजह से 80 फीसदी से ज्यादा प्रसूताएं गर्भावस्था में ही एनीमिया का शिकार हो रही हैं। इसका खुलासा स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट खुद कर रही है।

आदिवासी अंचलों की हालत सबसे ज्यादा दयनीय हैं। गर्भावस्था, बीमारी और इलाज के दौरान ग्रामीण डॉक्टरों को ढूंढते हैं। 50 फीसदी गांवों की अस्पताल विजिटिंग डॉक्टरों के भरोसे हैं। इसके बाद भी न तो
अफसर गंभीर हैं और न ही जनप्रतिनिधि सुध ले रहे हैं।

दस्तक अभियान में भी उजागर हुई खामियां
स्वास्थ्य सुविधाओं को घर-घर तक पहुंचाने की दिशा में हाल ही में स्वास्थ्य विभाग ने दस्तक अभियान चलाया था। इसमें भी ग्रामीण अंचलों मे लडख़ड़ाई स्वास्थ्य सुविधाएं उजागर हुई। दिसंबर में चलाए गए दस्तक अभियान में अतिकुपोषित की श्रेणी में 383 बच्चे चिह्नित किए गए। इसके अलावा 24 मासूमों को निमोनिया पाया गया। एक माह के भीतर 62 मासूम एनीमिया का शिकार पाए गए। इसके बाद भी कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।

पेट में मासूम और 21 हजार मां को एनीमिया
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस माह में 21 हजार प्रसूताएं एनीमिया का शिकार हुई हैं। अप्रैल 2017 से लेकर फरवरी 2018 तक स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 25 हजार 872 गर्भवती महिलाओं को चिह्नित किया गया। इसमें जांच के दौरान 21 हजार 308 महिलाएं एनीमिया की चपेट में मिली हैं। रिपोर्ट के अनुसार 21 हजार 308 महिलाएं 11 ग्राम हीमोग्लोबिन से कम मिली हैं, जबकि 2 हजार 53 प्रसूताएं ऐसी चिह्नित की गईं जो गंभीर एनीमिया यानी 7 हीमोग्लोबिन से कम मिली हैं। प्रसव काल में ही एनीमिया की चपेट में आने से नवजात पर भी काफी असर पड़ा। स्थिति यह थी कि कई मासूम जन्मजात विकृतियों का शिकार हो गए।

2600 मासूम अति कुपोषित, 1071 भर्ती
हाल ही में महिला बाल विकास विभाग द्वारा चलाए गए विशेष अभियान में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। आदिवासी गांवों में २६ सौ से ज्यादा मासूम अतिकुपोषण का दंश झेल रहे हैं। ये ऐसे मासूम हैं जो
कुपोषण पर फोकस न करने की वजह से अतिकुपोषण की श्रेणी में पहुंच गए हैं। उधर कुपोषण बच्चों के सुधार के लिए शुरू एनआरसी सेंटर्स भी अनदेखी की दास्तां बयां कर रहे हैं। अप्रैल 2017 से लेकर फरवरी 2018 तक एनआरसी सेंटरों में 1 हजार 71 मासूम भर्ती हुए हैं। यह अतिकुपोषण की श्रेणी में शामिल हैं। अतिकुपोषण के बाद मासूमों को एनआरसी में भर्ती करके कुपोषण के इस दंश से निकालने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें परिजनों की लापरवाही भी सामने आई है।

गर्भ में नहीं बनता सिर, 110 के पैरे टेढ़े
आदिवासी महिलाओं में देखरेख और समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने की वजह से गर्भ में ही बच्चों का सिर नहीं बन पा रहा है। सरकारी अस्पताल सहित जिले के सोनोग्राफी सेंटर्स के आंकड़े कुछ ऐसी ही स्थिति बयां कर रहे हैं। जिला अस्पताल के सोनोग्राफी यूनिट के अनुसार हर माह दो से तीन प्रसूताएं ऐसी आती हैं, जिनके गर्भ में पल रहे मासूम का सिर ही नहीं बन पाता है। कई ऐसे केस आते हैं कि बच्चे के सिर में पानी चला जाता है तो किसी केस में सिर का लूथड़ा बाहर आ जाता है। आदिवासी समाज की महिलाओं में यह बीमारी देखने को मिल रही है। देखरेख न होने से जन्मजात बच्चों के पैर मुडऩे की बीमारी सामने आ रही है। हाल ही में 110 बच्चे ऐसे चिहिंत किए गए हैं।

फैक्ट फाइल
गर्भवती महिलाएं - 25 हजार 872
एनीमिक प्रसूताएं - 21 हजार 308
अतिकुपोषित बच्चे - 2600

एनआरसी में भर्ती बच्चे - 1 हजार 71 मासूम
दस्तक में एनीमिक बच्चे - 62 बच्चे

एक्सपर्ट व्यू- मैदानी हकीकत बदलें
बाल कल्याण समिति समिति की सदस्य मेघा पवार के अनुसार मैदानी हकीकत बदलने की जरूरत है। तमाम योजनाएं चल रही हैं लेकिन कागज में नहीं मैदानी अमले पर ध्यान देना होगा। मेडिकल सुविधाएं बढऩी चाहिए। कम उम्र में शादी और प्रसव बच्चों को कुपोषण से घेरता है। आंगनबाड़ी केन्द्रों में पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। कई बार औपचारिकताएं होती हैं। घर- घर पहुंचकर योजनाओं का लाभ देना होगा और सुधार की इच्छाशक्ति लानी होगी।

बैठक लेंगे, गांवों में भेजेंगे टीम
शहडोल कलेक्टर नरेश पाल के मुताबिक कुपोषण एनीमिया और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर प्रशासन गंभीर है। स्वास्थ्य विभाग, महिला बाल विकास और कई विभागों की बैठक लेकर इस दिशा में प्रयास करने के निर्देश दिए जाएंगे। गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं में क्या कमी आ रही है। मैदानी अमला कहां लापरवाही कर रही है, एनालिसिस रिपोर्ट तैयार कराई जाएगी। लापरवाही अधिकारी कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाएगी।

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