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प्रदेश के गंभीर नवजातों को सरकारी अस्पताल में नहीं मिल रहा है निशुल्क योजना का फायदा

सीकर. प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गंभीर रूप से बीमार नवजात शिशुओं को निशुल्क इलाज देने की सरकारी योजना कागजों तक सीमित नजर आ रही है। नियोनेटल केयर के लिए डॉक्टरेट इन मेडिसिन (डीएम) योग्य चिकित्सकों की भारी कमी और मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना में किए गए हालिया बदलावों से इलाज की प्रक्रिया और जटिल हो गई है।
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Feb 25, 2026
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सीकर. प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गंभीर रूप से बीमार नवजात शिशुओं को निशुल्क इलाज देने की सरकारी योजना कागजों तक सीमित नजर आ रही है। नियोनेटल केयर के लिए डॉक्टरेट इन मेडिसिन (डीएम) योग्य चिकित्सकों की भारी कमी और मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना में किए गए हालिया बदलावों से इलाज की प्रक्रिया और जटिल हो गई है। हाल यह है कि प्रदेश में नियोनेटल विशेषज्ञों की भारी कमी है। वहीं अधिकांश जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में स्वीकृत पदों की तुलना में 40 से 50 फीसदी पद खाली हैं। वहीं कई अस्पतालों में एनआईसीयू बेड तो हैं, लेकिन प्रति 10 बेड पर एक भी डीएम स्तर का विशेषज्ञ नहीं है। जिसका नतीजा है कि गंभीर नवजात मामलों में से करीब 30 से 35 फीसदी बच्चों को बड़े शहरों के अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है। इसका सीधा असर गरीब व ग्रामीण परिवारों के नवजातों पर पड़ रहा है। हकीकत यह है कि नवजात मामलों में कुछ ही दिनों का एनआईसीयू खर्च 1से 2 लाख तक पहुंच जाता है। ऐसे में निशुल्क योजना में 50 हजार की सीमा तय करने से इलाज नहीं हो पाएगा।

यों हो रहा नुकसान

चिकित्सकों के अनुसार गंभीर उपचार के दौरान नवजात की देखभाल स्वभाव से ही जीवन रक्षक और क्रिटिकल होती है। इसमें एनआईसीयू, वेंटिलेटर, प्रशिक्षित स्टाफ और विशेषज्ञ निगरानी जरूरी होती है। सेकेंडरी स्तर पर यह सुविधाएं सीमित होती हैं, जिससे गंभीर मामलों में देरी और मौत का खतरा बढ़ता है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में डिप्लोमा इन चाइल्ड हेल्थ (डीसीएच) चिकित्सकों को नवजात देखभाल से बाहर करना गलत है। इन्हें राज्य सरकार, राजस्थान मेडिकल काउंसिल और नेशनल मेडिकल कमीशन से नवजात और बाल रोग दोनों में प्रैक्टिस की अनुमति है। ये नीट के जरिए मेरिट पर चयनित होते हैं। वर्षों से सरकारी व निजी क्षेत्र में नवजात देखभाल की रीढ़ बने हुए हैं।

डॉक्टर नहीं, इलाज अधूरा

विशेषज्ञों के अनुसार नियोनेटल केयर के लिए डीएम (नियोनेटलॉजी) या एमडी पीडियाट्रिक्स प्रशिक्षित डॉक्टर जरूरी होते हैं। लेकिन जिला और उपखंड स्तर के सरकारी अस्पतालों में यह पद लंबे समय से खाली हैं। जिसके कारण गंभीर नवजातों को वेंटिलेटर सपोर्ट, एडवांस मॉनिटरिंग और विशेषज्ञ निगरानी समय पर नहीं मिल पाती। वहीं क्लेम के रिजेक्शन के डर से कई निजी अस्पताल योजना के तहत नवजात मामलों को लेने से बच रहे हैं। पैकेज दर कम होने से गंभीर केस स्वीकार नहीं किए जा रहे। वहीं कैशलैस इलाज में देरी के चलते परिजनों को पहले नकद खर्च करना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों को पहले जिला अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज रेफर किया जा रहा है। इससे नवजात के इलाज में 6 से 12 घंटे तक की देरी हो रही है। वहीं यात्रा और दवाओं पर रोजाना 5 से 15 हजार रुपए तक का खर्च उठाना पड़ रहा है।

इनका कहना है

सरकार की मंशा नवजातों को निशुल्क और बेहतर इलाज देने की है, लेकिन जब तक नियोनेटल केयर के लिए पर्याप्त डीएम चिकित्सकों की नियुक्ति ओर मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोगय के प्रावधानों में व्यावहारिक सुधार नहीं होता, तब तक गंभीर नवजातों को निशुल्क इलाज का सपना अधूरा ही रहेगा। इसको लेकर विभागीय अधिकारियों को लिखित में अवगत कराया जा चुका है।

विशेष व्यास, प्रदेश उपाध्यक्ष, प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन

Updated on:
25 Feb 2026 11:38 am
Published on:
25 Feb 2026 11:38 am
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