
सीकर. ईद का त्योहार ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा है,बाजारों में रौनक बढ़ती जा रही है। छोटे-बड़े सभी खरीदारी में जुट रहे हैं। वहीं छोटे बच्चे भी रोजे रख रहे हैं। रोजा रख रही बालिका सफाना, सरफ, मुश्कान व असराना ने बताया कि रोजा रखने से तन व मन दोनों सही रहते हैं। हर व्यक्ति को रोजा रखने चाहिए।
इमाम बोले ईद के बाद होगा एक रोजा
ईदगाह मस्जिद में शहर के उलेमा कराम की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में यह निर्णय किया गया कि रमजान 18 मई के बजाय 17 मई से माना जाए। एतकाफ और शब-ए-कद्र की रातों का एहतमाम इसी हिसाब से किया जाए। ईद के बाद एक रोजा कजा किया जाए। इस हिसाब से मंगलवार से शहर की मस्जिदों में एतकाफ शुरू हो गया है।
रोजा नफ्स की तरबियत
रमजान का महीना अपने आखिरी अशरे में पहुंच चुका है। अल्लाह के आखिरी रसूल हजरत मुहम्मद स.अ.व. ने फऱमाया कि ऐ लोगो, तुम्हारे ऊपर एक बड़ा बरकत वाला महीना नाजिल हुआ है। इसकी एक रात हजार महीनों से ज्यादा अफजल है। इस रात से मुराद शब-ए-कद्र है। इस रात में अल्लाह ने कुरआन मजीद नाजिल फऱमाया। हदीस में आता है कि जो शख्स शब-ए-कद्र में इबादत के लिए खड़ा रहे उसके तमाम पिछले गुनाह माफ हो जाते हैं। रमजान का आखिरी अशरा बहुत अहम है। इसमें जहन्नम की आग से निजात है। इसकी ताक रातों में शब-ए-कद्र है। एतकाफ रमजान के आखिरी अशरे में की जाने वाली एक अहम इबादत है।
हमदर्दी का महीना
रोजा नफ्स की तरबियत है। इस का मकसद है तक्वा हासिल करना। ये लोगों के साथ हमदर्दी का महीना है।
- जुनैद अख्तर नदवी, इस्लामिक स्कालर