काश्तकार ओबाराम कलबी खेती में उपयोगी कई कृषि यंत्रों के मामले में आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों में जुटे हैं। वे खेती में उपयोग में लिए जाने वाले पेरणी तथा रोपड़ी उपकरण समेत कई छोटे- मोटे यंत्रों को बनाकर अपनी कारीगरी का प्रदर्शन कर रहे हैं।
मंडार (सिरोही)। रेवदर उपखंड में सर्वाधिक तथा साल में दो बार मूंगफली की बुवाई कर बंपर पैदावार यानी उपज ली जाती है। लेकिन, उसे निकालने में मजदूरी पर भारी खर्च आता है। मजदूरी पर अधिक खर्च बचाने में समीपवर्ती बांट के काश्तकार ओबाराम कलबी खेती में उपयोगी कई कृषि यंत्रों के मामले में आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों में जुटे हैं। वे खेती में उपयोग में लिए जाने वाले पेरणी तथा रोपड़ी उपकरण समेत कई छोटे- मोटे यंत्रों को बनाकर अपनी कारीगरी का प्रदर्शन कर रहे हैं। दरअसल ओबाराम किसान मित्र भी है। उन्होंने बताया वे बाजार से लोहा खरीदकर कर खेत में खड़ी फसल की दो कतारों के बीच की खरपतवार निकालने में उपयोगी रोपड़ी तथा पेरणी यंत्र अपने हाथों से ही बनाये थे। आज ये यंत्र काफी फायदेमंद साबित हो रहे है।
इन दिनों उन्होंने एक डीजर यंत्र बनाया है। जो मूंगफली की तैयार फसल को निकालने का काम कर रही है। यह डीजर भूमि से पैदावार निकाल रही है। बुवाई के समय बीज व खाद समान मात्रा में खेत में डालने के यंत्र पहले बना चुके है। जो पानी का भी छिडकाव करते है। ओबाराम ने बताया कि गांव में जल स्तर की स्थिति अच्छी है। सिंचाई सुविधा मिलने से फसलों की पैदावार भी अच्छी होती है। यहां मूंगफली की साल में दो बार बम्पर बुवाई होती है। डीजर से मूंगफली की फसल निकालने में ज्यादा मजदूर नहीं लगाने पड़ते। यह यंत्र एक घंटे में करीब चार बीघा जमीन से मूंगफली निकाल सकती है।
ओबाराम ने बताया कि तीन चार बीघा से मूंगफली निकालने में तीस मजदूर लगाते है। प्रति मजदूर 400 दिहाड़ी तथा 50 किराया तथा एक दो किलो मूंगफली यानी पंद्रह हजार का खर्च होते थे। जबकि यंत्र घंटे में चार बीघा से मूंगफली निकालती है। जिसका खर्च मात्र दो हजार रुपए है। इसको बनाने में 14दिन, 700 किलो लोहा समेत ढाई लाख रुपए खर्चा आया। यंत्र में ऑयल वाली ऑर्बिट मोटर लगाई है। जिससे उसकी स्पीड बढ़ाई जा सकती है। स्पीड बढ़ाने पर प्रतिदिन 200 बीघा से मूंगफली निकली जा सकती है।