. वर्ष 2012 में परिसीमन के दौरान अस्तित्व में आयी ओबरा विधानसभा सीट पर बसपा के भरोसेमंद कैलाशनाथ यादव ने अपनी बिसात बिछाई। उन्होंने सभी विरोधियो को पस्त करते हुए अपने पुत्र सुनील सिंह यादव के सिर जीत का सेहरा बांधकर अपनी काबिलियत साबित की। बता दें कि अस्तित्व में आने से पहले ओबरा विधानसभा का अधिकांश हिस्सा पहले दुद्धी सीट में आता था, जहां आदिवासी नेता विजयसिंह गोंड का प्रभाव रहता है।
वर्ष 2012 के चुनाव में कांग्रेस में रहे गोंड का ढीला पड़ना सुनील सिंह यादव के लिए मुफीद रहा और यादव समेत बसपा के पारंपरिक वोटों की बदौलत बड़े आसानी से सुनील ने यह चुनाव जीत लिया। लेकिन चुनाव जीतने के बाद कभी भी क्षेत्र में न जाने वाले सुनील सिंह यादव की लोकप्रियता बहुत तेजी से गिरने लगी और कार्यकाल खत्म होने से काफी पहले ही सुनील सिंह ने ओबरा छोड़कर रॉबर्ट्सगंज का रुख कर लिया।
ओबरा सीट पर बसपा ने हल्द्वानी में जाकर बस गए व्यवसायी सुभाष अग्रहरी पर अपना दांव लगाया है, तो सपा ने जातिगत आंकड़ो को ध्यान में रखते हुए दो बार के ब्लॉक प्रमुख संजय यादव को मैदान में उतारा है । वही कांग्रेस और भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन कुछ भी हो राजनीति के जानकारों का कहना है कि जिले को दो भाग में बांटने वाली सोन के दक्षिणी हिस्से में विजय उसी की होगी जिसे विजय सिंह गोंड का वरदहस्त प्राप्त होगा ।
ओबरा विधानसभा सीट पर मतदाताओं की संख्या
जातिगत आधार पर मतदाताओं की संख्या