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रियलिटी चेक: हरियालो राजस्थान की खुली पोल, ‘मां के नाम पेड़’ लगाया… फोटो खिचाया, भूल गए, 90% पौधे सूखे

हरियालो राजस्थान अभियान की खुली पोल। जयपुर संस्कृत यूनिवर्सिटी में 76वें वन महोत्सव पर CM और मंत्रियों के लगाए 'कृष्ण वट' समेत 90% पौधे दीमक की भेंट चढ़कर सूख गए।
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Aug 24, 2026
hariyalo rajasthan
जयपुर. पौधरोपण वाली कई जगह पर ट्रैक्टर से जुताई कर दी गई है। कुछ सेक्टर में दोबारा 7 हजार पेड़ लगाए गए हैं। (Photo- Patrika)

जयपुर. 'हरियालो राजस्थान' महाअभियान की जमीनी हकीकत उसके दावों से बिल्कुल उलट निकली है। 2.5 करोड़ पौधे लगाने के इस महाअभियान की चमक-दमक के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई राजधानी जयपुर के संस्कृत विश्वविद्यालय में उजागर हुई है। यहां 27 जुलाई 2025 को आयोजित 76वें वन महोत्सव में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और वनमंत्री ने जो 'वीआइपी पौधे'- खासकर कृष्ण वट- लगाए थे, वे भी दीमक की भेंट चढ़ गए। ये पौधे 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के तहत लगाए गए थे। तत्कालीन डीसीएफ केतन कुमार बताते हैं कि इन वीआइपी पौधों के दीमक खा जाने के बाद उनकी जगह नए पौधे लगाने पड़े। पत्रिका के 'रियलिटी चेक' में सामने आया कि इस भव्य आयोजन में रोपे गए करीब 90 फीसदी पौधे सूख चुके हैं। अब वहां हरियाली की जगह सिर्फ सूखे तने और खाली गड्ढे नजर आते हैं। रखरखाव के लिए कोई बजट न होने की यह हकीकत और अपनी नाकामी छिपाने के लिए विभाग ने गुपचुप तरीके से करीब सात हजार नए पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी है।

तय नहीं थी पौधे बचाने की जिम्मेदारी

'हरियालो राजस्थान' के तहत प्रदेश में करीब 2.5 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था। संस्कृत विश्वविद्यालय में अभियान के बाद सिंचाई और रखरखाव के लिए वन विभाग के पास अलग से कोई बजट ही नहीं था। विभाग का कहना है कि पौधरोपण के बाद पानी, सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन ने मौखिक रूप से स्वीकार की थी। तत्कालीन डीएफओ ने रखरखाव के लिए जरूरी फंड मांगते हुए वन विभाग मुख्यालय को पत्र भी लिखे, लेकिन समाधान नहीं हुआ। पौधे लगाने के लिए पूरा तंत्र सक्रिय रहा, मगर उन्हें बचाने की जिम्मेदारी किसी की तय नहीं थी। संस्कृत विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और सहायक रजिस्ट्रार से संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों टाल-मटोल करते रहे और कोई जवाब नहीं दिया।

यहां का डेटा नहीं

अभियान के तहत जियो-टैगिंग के जरिए पौधों की लोकेशन और सर्वाइवल की डिजिटल निगरानी का दावा किया गया था, लेकिन संस्कृत विवि के मामले में ऐसा कोई सार्वजनिक और सत्यापन योग्य डेटा सामने नहीं आया। न पौधों की पहचान दर्ज है, न लोकेशन। यहां लगाए गए बाकी 12 हजार पौधों में से कितने अब भी जीवित हैं, इसका भी कोई स्पष्ट रेकॉर्ड मौजूद नहीं है।

Updated on:
24 Aug 2026 03:08 pm
Published on:
24 Aug 2026 03:03 pm