- श्रीगंगानगर में बेघर लोगों ने रैन बसेरे से बनाई दूरियां, नगर परिषद के दम पर बचाव का जुगाड़, जिला प्रशासन ने नहीं उठाया कोई कदम
श्रीगंगानगर. ठंडी रात… शहर सो रहा था, पर सड़क किनारे जिंदगी फिर भी जाग रही थी। सोमवार देर रात पत्रिका टीम ने शहर के मुख्य मार्गों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थलों के आसपास हालात का जायजा लिया तो कई जरूरतमंद लोग डिवाइडर, पार्किंग स्थलों और रेहड़ियों के नीचे सिमटकर सोते मिले। न्यूनतम तापमान करीब पाँच डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने के बावजूद यह लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर थे। इनमें से कुछ के पास बिछाने के लिए कम्बल और चादर थी, तो कोई अपनी ठेली के पहिए के पास सिकुड़कर सोया हुआ था। ठंडी हवा के झोंके बदन को चुभते रहे, फिर भी उनके चेहरों पर थकान की नींद भारी दिखी। वहीं रात का तापमान गिरता जा रहा है पर फुटपाथों पर जिंदगी ठिठुरन के साथ चल रही है। प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद अस्थायी मजदूरों, ठेले वालों और बेघरों के लिए यह रातें चुनौती बनी हुई हैं। कई लोगों ने कहा कि अगर रैन बसेरों तक पहुँच आसान हो, कामकाजी लोगों के लिए अलग व्यवस्था और सुरक्षा की गारंटी हो तो वे वहाँ जाना पसंद करेंगे।
रैन बसेरा पास पर कदम वहां तक नहीं पहुँचते
नगर परिषद की ओर से शास्त्री बस्ती में रैन बसेरा संचालित है, लेकिन वहाँ जाने से कतराने की वजह बताई। छत्तीसगढ़ से आए 35 वर्षीय युवक गणेश ने तो रेलवे स्टेशन के मुख्य गेट के पास पार्क में ही अपना डेरा जमा लिया। इस युवक का कहना था कि रेन बेसरा कहां है, उसे पता नहीं। वह तो यहां दो घंटे सुकून की नींद ले लेता हूं। मजदूरी करने के लिए आया था और यहां का बन गया।
डिवाइडर पर मिला चूनावढ़ का जगदीश
रवीन्द्र पथ पर कोडा चौक के पास डिवाइडर पर सो रहे चूनावढ़ निवासी 45 वर्षीय जगदीश नायक तीन कम्बल के साथ सोया हुआ मिला। उसने बताया कि वह दिन में मजदूरी कर लेता है और खाने का जुगाड़ हो जाता है। कभी कभार आसपास के दुकानदार उसे खाने को कुछ न कुछ देते है। ज्यादा ठंड लगने पर आधी रात के बाद बंद दुकानों के आगे जाकर सो जाता है। परिवार से दूरियां बनाकर यहां रहने लग गया है। नए कम्बल लोग देने आते है लेकिन कई नशेड़ी ऐसे कम्बल चुरा ले जाते है।
सुबह जल्दी चाय की थड़ी संचालित करने की मजबूरी
केन्द्रीय बस स्टैंड के बाहर रेहड़ी में दुबक कर सोए रावला निवासी 62 वर्षीय हंसराज का कहना था कि वह अब तक अविवाहित है। माता पिता की मौत के बाद वह इस दुनिया में अकेला रह गया। ऐसे में वह वर्ष 2002 में यहां आकर रिक्शा चलाने लगा। शरीर ढीला पड़ा तो कोडा चौक पर चाय की थड़ी खोल ली। रैन बसेरे की बजाय रेहडी के अंदर सोने का जुगाड़ बना लिया। रैन बेसरे मेें एक बार जाकर आया था लेकिन वहां सोने का मजा नहीं आया, एकांत में सोने का ज्यादा सुकून मिलता है।
रैन बेसेर में रौनक, कई मजबूरी में आए तो कई अभ्यार्थी आए
शास्त्री बस्ती में संचालित रैन बेसेर में पत्रिका टीम जब पहुंची तब यहां खूब चहल पहल देखने को मिली। सेतिया कॉलोनी निवासी 62 वर्षीय कुलवंत राम यहां लंबे समय से रहने लग गया है। उसने बताया कि परिवार से अलग होकर यहां रहना अच्छा लगता है। इसी प्रकार हिसार जिले की शिवानी मंडी निवासी सत्यप्रकाश ने मजदूरी की वजह से यहां आना बताया। उसने बताया कि रैन बेसेरे की व्यवस्था देखकर वह गत तीन दिन से यहां आकर सोता है। वहीं जयपुर से आए अमन शर्मा और मोनू शर्मा बीएसएफ की भर्ती में प्रतियोगी बनकर आए है। इन शर्मा बंधुओं का कहना था कि कई युवा जयपुर और भरतपुर से आए और यहां रात को आराम करने पहुंचे। सुबह बीएसएसएफ मैदान में जाकर दौड़ लगाएंगे।
व्यवस्था में कोई कमी नहीं
इधर, नगर परिषद के रैन बेसेरा प्रभारी अरविन्द ने बताया कि सोमवार रात साढ़े दस बजे तक बारह जनों को अलग अलग बिस्तर देकर सुलाया। पूरे दिन में 21 लोगों ने इस रैन बेसरे की सुविधा उठाई। यहां अब रजिस्टर लगाया गया है ताकि हर आंगुतक के नाम, पता और मोबाइल नम्बर अंकित कर एंट्री हो रही है। इसके अलावा दमकल कार्मिकों की मदद से आधी रात को खुले में सोने वाले लोगों को यहां रैन बसेरे लाने की व्यवस्था है लेकिन ज्यादातर नियमित लोग नहीं आते है।