
- संदीप खमेसरा
किसी भी संकल्प को पूरा करने के लिए एक ज़िद होती है। हमेशा कुछ पाते रहने की ज़िद की नींव भी बचपन से पड़ जाती है। जरूरत की चीज़ें, फिर शौक की और फिर दिखावे की। इन्हीं चीज़ों को इक्कठा करने की बेइंतहा ज़िद, जीवन पर्यंत व्यक्ति पाले रखता है। मनुष्य की लालसा पूर्ति में ही जिद के अलग अलग आयाम प्रकट होते हैं।
बचपन से चीज़ों के संग्रहण की ज़िद। शैक्षणिक स्तर पर फिर कुछेक में अच्छे नंबर लाने की ज़िद। कुछ में बिल्कुल बेपरवाह रहने की ज़िद, तो कईयों को लापरवाह बने रहने की। नौकरी लगने और शादी होने के बाद, पैसा कमाने की ज़िद! ज़िद एक बहाव है, जो यदि सही दिशा और उचित संकल्प को पूरा करने में लगे तो जीवन बेहतर बन सकता है।
वर्तमान में एक ज़िद का विकास सबको करना चाहिए। स्वयं को स्वस्थ रखने की ज़िद! खराब आहार, शरीर को प्रतिदिन नुकसान पहुंचा रहा है। दवाइयों पर भरोसा रहा नहीं। कितनी नकली दवाइयां बाजार में उपलब्ध हैं। चिकित्सा का व्यवसाय, अपनी निकृष्टता के चरम पर है। आरक्षण के आधार से जो चिकित्सक बन रहें हैं, उनमें से कितने प्रतिशत वाकई चिकित्सा को समझते हैं? बड़े अस्पतालों में हम उनके हवाले हो जाते हैं। उसके ऊपर दवाइयों में कमीशन, जांचों में कमीशन, छोटे बड़े ऑपरेशन के टारगेट। हेल्थ बीमा होने से मरीज को रुपया खर्च करने में परेशानी नहीं और इसी चक्कर में अस्पतालों के खेल निराले चलने लगे। छोटी सी बीमारी, बेमतलब की जांचें और अब तो बिना बीमारी सर्जरियां भी हो जाएं तो आश्चर्य नहीं। इस ईश्वर तुल्य प्रोफेशन की जो गत बिगड़ी है, ईश्वर कैसे बचाएगा? क्योंकि स्वास्थ्य के रक्षक चिकित्सकों को ही हमने ईश्वर मान रखा है।
एक ही लक्ष्य। एक ही संकल्प। एक ही ज़िद। मैं अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्वयं लूंगा! मेरा पैसा, मेरे संग्रहण, मेरा नाम, मेरे संपर्क, मेरा रुतबा...कुछ भी काम आने का नहीं। पैसे से इलाज जरूर होगा, लेकिन क्या वह वास्तव में इलाज होगा। पैसे का धुंआ भी होगा और एक बार चंगुल में फंसने के बाद शरीर का नाश तो फिर जब तक जीवन रहेगा, होना ही है! तो, पलट तेरा ध्यान किधर है भाई, अपनी जिद के प्रवाह की धारा को मोड़ने का संकल्प आज ही उठाना होगा।
छोटे छोटे प्रयास। जीवनशैली से संबंधित। नियमित व्यायाम, संयमित आहार। जिद से सबसे पहले इन्हें साधना होगा। फिर एक बड़ी ज़िद, व्यसनों से छुटकारा पाने की। आसान नहीं, लेकिन जैसे पैसा और चीजें पाने की ज़िद्द उठाई, वैसे ही संकल्पित तो होना होगा। यह गुलामी से बाहर आने की जिद होगी, जिससे जीवन में नए प्रकाश का आविर्भाव होगा। मौज शौक के लिए, जो सही है वह मोटे रूप से जीवन के लिए महत्वपूर्ण है या नहीं, यह समझ तो आनी चाहिए।
बेहतर जीवन के लिए प्राथमिकताओं का एक सिरे से उलटफेर करना पड़े तो भी कोई संकोच और अफसोस नहीं होना चाहिए। किसे दिखाने के लिए या किसे प्रभावित करने के लिए हमें वैसा जीवन जीना चाहिए, जिसकी "जीवन" के संदर्भ में कोई प्रासंगिकता न हो।
बचपन से लैपटॉप और मोबाइल की रोशनी आंखों को प्रभावित कर रही। पोश्चर ने जवानी में ही गर्दन और कमर को दुनियाभर के रोग दे दिए। ताजी हवा और धूप में कुछ देर बैठने की फुर्सत नहीं। ठीक से सांस लेना आता नहीं। बाहर के बेतहाशा खान पान ने पेट की सेहत पहले ही खराब कर दी। सारे रोग पेट ही से शुरू होते हैं। शरीर ने एक बार पटरी छोड़ी, तो मानसिक स्वास्थ्य भी चपेट में आना निश्चित है। अवसाद के मामले जिस कदर बढ़ रहे हैं, यह लाल बत्ती का ही संकेत है। वृत्ति की गुलामी, प्रतिदिन स्वयं के लिए खौफनाक मकड़जाल बुन रही है। लंबी परेशानी जब आती है, तब ऐसा लगता है, जैसे जीवन ने खिलवाड़ कर दिया। दगा, जीवन नहीं देता। हमारे आचरण और आदतों से ही हम ठगे जाते हैं। इससे निपटने के लिए ज़िद्द ही पकड़नी होगी।
जीवन की बेहतरी के लिए पकड़ी ज़िद से क्या होगा। शायद भौतिक सफलताओं के पैमानों पर थोड़े पीछे रह जाएंगे! मर्सिडीज की जगह कोई अन्य गाड़ी होगी। बड़े विला की जगह थोड़ा छोटा घर होगा। अरबों की दौलत नहीं, कम होगी। लेकिन, एक अवसर ऐसा आयेगा, जब इस शरीर को चिकित्सकों के गिरवी रखने की नौबत नहीं आएगी तब महसूस होगा कि असली संपत्ति तो आपने कमाई और बचाई। और यक़ीनन, यह एक विचार ही आपको उमंग और उल्लास से परिपूर्ण बनाए रखेगा। छोड़िए बड़ी बड़ी जिद, और इस छोटी से जिद से श्रीगणेश करिए अपने नवजीवन का।