उदयपुर

किताब से निकलकर ज़िंदगी में कैसे उतरे संविधान

Aug 14, 2026
Rajasthan

आइआइटी के बाद अब खेती कर रहीं आशिमा बता रहीं कर्तव्य से शुरू हुई एक यात्रा
- अशिमा गोयल सिराज, सह-संस्थापक, अनकॉम्प्रोमाइज़्ड

कुछ महीने पहले मैं दिल्ली के प्रधानमंत्री संग्रहालय में भारत के संविधान की पहली मुद्रित प्रति के सामने खड़ी थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि उस पल में क्या हुआ, पर कुछ अंदर शांत हो गया। घर लौटकर मैंने अपने दादाजी की संविधान की प्रति फिर से निकाली- जो अब मेरे पास उनकी एकमात्र निशानी है और वर्षों बाद पहली बार उसे ध्यान से पढ़ा। इस बार मेरी नज़र अनुच्छेद 51क- नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों - पर टिक गई। इसमें दो पंक्तियों ने मुझे भीतर तक छू लिया।
पहली, खंड (छ) - "प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखे।"

और दूसरी, इसके ठीक बाद, खंड (ज)- "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।"

ये दोनों कर्तव्य 1976 में संविधान में जोड़े गए- उस समय से बहुत पहले जब "सस्टेनेबिलिटी" या "क्लाइमेट एक्शन" जैसे शब्द किसी की ज़ुबान पर भी नहीं थे। पर जितना मैं इन्हें पढ़ती गई, उतना ही साफ़ होता गया- ये दो कर्तव्य अलग-अलग नहीं हैं। पहला दूसरे के बिना अधूरा है। सिर्फ पर्यावरण की रक्षा करने की इच्छा काफ़ी नहीं - वह रक्षा तभी सतत और सच्ची बनती है जब वह वैज्ञानिक सोच, जिज्ञासा और सुधार की भावना से निकले। यानी खंड (ज) वह रास्ता है जिससे खंड (छ) तक पहुंचा जा सकता है।

हमारे स्कूलों में हर बच्चे ने कभी न कभी संविधान पढ़ा है- पर किताब में। असली सवाल यह है कि यह किताब से निकलकर ज़िंदगी में कैसे उतरे। और इस स्वतंत्रता दिवस पर, मुझे शहर और आसपास के कुछ ऐसे लोग दिखते हैं जो, बिना जाने, इन दोनों कर्तव्यों को एक साथ जी रहे हैं।

क्लाइमेट एक्शन चैलेंज में इस साल 105 टीमों ने हिस्सा लिया- 41 स्कूलों से, उम्र 14 से 18 साल के बीच। इन बच्चों ने अपने आसपास देखा- फतह सागर की हालत, सुखेर के पास संगमरमर की धूल, अपने स्कूल के बाहर कचरे का ढेर और सिर्फ भावनात्मक रूप से चिंता नहीं जताई, बल्कि जांच की, प्रयोग किए, नाकामियों से सीखा, और दोबारा कोशिश की। यही भावना मुझे बड़गांव के एक छोटे से बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में भी दिखती है, जहां लड़कियां चुपचाप एक छोटी सी क्रांति कर रही हैं। अपने ही स्कूल के परिसर में क्यारियां बनाकर, वे सब्ज़ियां उगा रही हैं - बिना किसी रासायनिक खाद या दवा के, पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से। यह भी वही जिज्ञासा है, वही सीखने और सुधारने की भावना है, जो अब मिट्टी में उतर आई है।
यही कहानी हमें खेतों में भी दिखती है, बस उम्र और मंच अलग हैं।

रमन सिंह जैसे युवा किसान इसका सबसे सच्चा उदाहरण हैं। झाड़ोल ब्लॉक के तिणदोरी गांव में, रमन ने अपनी छोटी सी ज़मीन पर सिर्फ दो फसलों से शुरुआत की - यह जानते हुए कि सालों की रासायनिक खेती ने उनकी मिट्टी को धीरे-धीरे कमज़ोर कर दिया था। उन्होंने प्राकृतिक, पुनर्योजी खेती की राह चुनी - यह राह सिर्फ भावना से नहीं, बल्कि मिट्टी को समझने, प्रयोग करने, और हर मौसम में कुछ नया सीखने से बनी। आज वे सिर्फ अपनी ज़मीन तक सीमित नहीं - आसपास के जंगलों और वहां रहने वाले जीव-जंतुओं की रक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं और अपने इलाके के दूसरे किसानों को भी इस राह पर लाने में जुटे हैं।

रमन, उन स्कूली छात्राओं, और हमारे क्लाइमेट एक्शन चैलेंज के छात्रों में एक गहरी समानता है। सबने अपने आसपास कुछ टूटा हुआ देखा, और चुपचाप, बिना इनाम की उम्मीद के, उसे समझने और ठीक करने में जुट गए- जिज्ञासा से, संवर्धन से, और लगातार सीखने की भावना से।

हमारा संविधान हमसे यह उम्मीद नहीं करता कि हम अकेले जलवायु परिवर्तन को हल कर दें। वह सिर्फ इतना कहता है - अपने आसपास की ज़मीन, पानी, हवा और जीवों की परवाह करो, और यह परवाह वैज्ञानिक सोच और सुधार की भावना से निभाओ।

जब मैं इन छात्रों, इन स्कूली लड़कियों, और इस युवा किसान को देखती हूं, तो लगता है कि आजादी का असली मतलब शायद यही है- यह चुनने की आजादी कि हम अपने इन कर्तव्यों को कैसे निभाएं। कोई एक प्रयोगशाला में, कोई एक क्यारी में, कोई एक खेत में। पर सब एक ही धागे से जुड़े हैं। कुछ विरासतें बहुत धीमी आवाज में मिलती हैं। पर वे उतनी ही गहरी होती हैं।

Updated on:
14 Aug 2026 06:01 am
Published on:
14 Aug 2026 06:01 am