
उदयपुर. राजस्थान के अडिंदा पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र में आस्था, प्राचीनता और अनूठी वास्तुकला का संगम देखने को मिलता है। तालाब के किनारे स्थित यह जैन तीर्थ करीब 1500 वर्ष प्राचीन दक्षिणमुखी मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में प्राचीन रचनाओं के साथ भव्य पर्वत, गुफाएं, सरोवर और विशाल प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। क्षेत्र में मूलनायक मंदिर सहित कुल छह मंदिर और 125 प्रतिष्ठित प्रतिमाएं विराजमान हैं।
शिलालेखीयसाक्ष्यों के अनुसार संवत 1100 (संवत 1011) में इस क्षेत्र की भव्य प्रतिष्ठा हुई थी। मान्यता है कि भूगर्भ से निकलते समय मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की ओर था। बाद में प्रतिमा का मुख पूर्व दिशा की ओर करने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद से यह प्रतिमा दक्षिणमुखी स्वरूप में ही विराजमान है।
नवरात्रि में नौ दिन होता है विधान
अडिंदा पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र को अत्यंत प्रभावकारी माना जाता है। मान्यता है कि माता पद्मावती और भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन-पूजन से शारीरिक व मानसिक व्याधियों, रोग तथा भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति मिलती है। चैत्र और आसोज (आश्विन) मास की नवरात्रि में यहां नौ दिवसीय 'पार्श्वनाथ पद्मावती विधान' आयोजित किया जाता है। इसमें दूर-दूर से श्रद्धालु मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।
कैलाश पर्वत की गुफा में शांतिनाथ की प्रतिमा
मंदिर परिसर में निर्मित कैलाश पर्वत और इसकी गुफा विशेष आकर्षण का केंद्र है। गुफा में भगवान शांतिनाथ की 6.5 फीट ऊंची खड्गासन प्रतिमा स्थापित है। यहां कुल 48 देवरियां हैं। इनमें 24 भूतकाल और 24 भविष्य काल के तीर्थंकरों की प्रतिमाएं सुसज्जित है। वर्तमान के तीर्थंकराें की प्रतिमाएं पर्वत के द्वार के सामने पूर्व एवं पश्चिममुखी है।
सुमेरू पर्वत और पद्म सरोवर भी आकर्षण
परिसर में सुमेरू पर्वत पर भगवान महावीर की नौ फीट ऊंची पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। वहीं पद्म सरोवर में 15 फीट ऊंचे कमल पर भगवान पार्श्वनाथ की 21 फीट ऊंची खड्गासन प्रतिमा दर्शनीय है। यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
1100 साल पुरानी रचना के रूप में नंदीश्वर द्वीप
मंदिर क्षेत्र में करीब 1100 वर्ष पूर्व की प्राचीन रचना के रूप में नंदीश्वर द्वीप और उसके पीछे मानस्तंभ स्थापित है। यह क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य परंपरा और धार्मिक विरासत को दर्शाता है।
आधुनिक विकास में कुंथुसागरजी का मार्गदर्शन
क्षेत्र के आधुनिक विकास और भव्य निर्माण कार्यों में गणधराचार्य कुंथुसागर महाराज का विशेष मार्गदर्शन रहा है। अतिशय क्षेत्र से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित बाढ़दा-कलां गांव गणधराचार्य की जन्मस्थली है। यहां प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और क्षेत्रपाल जी का प्राचीन मंदिर भी स्थित है।
मेले में जुटते हैं श्रद्धालु
अडिंदा पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र में प्रतिवर्ष पौष दशम एवं ग्यारस को वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है। बाहरी क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए क्षेत्र में आवास, भोजनशाला और कैंटीन की व्यवस्था उपलब्ध है। प्राचीन मूलनायक प्रतिमा, विशाल प्रतिमाओं, पर्वतों, गुफाओं और प्राचीन धार्मिक रचनाओं के कारण यह क्षेत्र जैन समाज के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल है।
ऐसे पहुंच सकते
उदयपुर-चित्तौड़ मार्ग पर भटेवर से 10 किलोमीटर अंदर अडिंदा गांव में मंदिर मौजूद है। यह उदयपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर है। डबोक एयरपोर्ट से 20 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए सूरलपोल से अडिंदा तक निजी बसें उपलब्ध है। इसके साथ ही टैक्सी या निजी वाहनों से भी पहुंचा जा सकता है। मंदिर प्रबंधन देखने वाली ट्रस्ट अडिंदा ट्रस्ट की ओर से मंदिर में ही धर्मशाला भी बनी हुई है।