
उदयपुर. फतहसागर झील के शांत पानी के बीच स्थित टापू पर स्थापित उदयपुर सौर वेधशाला ने अपने 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1975 में 20 सितंबर को प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. अरविंद भटनागर की दूरदर्शी सोच के साथ स्थापित यह वेधशाला आज वैश्विक स्तर पर सौर और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की सशक्त पहचान बन चुकी है। 50 साल पहले इसकी स्थापना के समय राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और गुजरात के मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल मौजूद थे। यह वेधशाला भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला अहमदाबाद के अधीन काम करती है।
झील के टापू पर स्थापना का वैज्ञानिक कारण
उदयपुर को सौर वेधशाला के लिए चुने जाने के पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण थे। आम तौर पर सूरज की तेज गर्मी से जमीन गर्म होती है और उसके संपर्क में आने वाली हवा में तीव्र हलचल पैदा होती है, इससे दूरबीन से मिलने वाली तस्वीरों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। फतहसागर झील के बीच टापू पर स्थित होने से आसपास का विशाल जलक्षेत्र इस वायुमंडलीय तपन और हलचल को काफी हद तक नियंत्रित कर देता है। इसके साथ ही उदयपुर में साल के अधिकांश दिनों में साफ आसमान उपलब्ध रहता है, इससे सूर्य के निरंतर और उच्च गुणवत्ता वाले प्रेक्षण संभव हो पाते हैं।
स्पेस वेदर और उपग्रहों की सुरक्षा पर बड़ा फोकस
वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर भुवन जोशी ने बताया कि वेधशाला का प्राथमिक कार्य सूर्य की घटनाओं और 100 किमी से ऊपर के अंतरिक्ष वातावरण की निगरानी करना है। सूर्य की सतह पर होने वाले विशाल विस्फोट, जैसे सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन, अंतरिक्ष में भारी मात्रा में ऊर्जा और आवेशित कण छोड़ते हैं। आज की पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, संचार माध्यम, जीपीएस नेविगेशन और उपग्रह प्रणालियां अंतरिक्ष संपत्तियों पर निर्भर हैं। ऐसे में स्पेस वेदर में होने वाले अप्रत्याशित बदलाव इन उपग्रहों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। उदयपुर सौर वेधशाला इन सौर विस्फोटों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग और सटीक पूर्वानुमान पर काम कर रही है।
जमीन से अंतरिक्ष तक का समन्वय: आदित्य एल-1 के साथ तालमेल
पारंपरिक तौर पर ऑप्टिकल और एच-अल्फा प्रेक्षणों से शुरू हुई इस यात्रा में अब रेडियो तरंगों के जरिए अध्ययन भी शामिल हो चुका है। अक्टूबर 2018 से यहां कैलिस्टो रेडियो वेधशाला सक्रिय है, जो सौर विस्फोट और प्लाज्मा प्रक्रियाओं को समझने में मदद करती है। उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी में स्थापित मल्टी-एप्लीकेशन सोलर टेलिस्कोप (मास्ट) सूर्य के उच्च विभेदन अध्ययन के लिए देश की प्रमुख सौर दूरबीनों में से एक है। 50 सेंटीमीटर व्यास वाली यह दूरबीन सूर्य की सतह और उसके वायुमंडल की सूक्ष्म संरचनाओं तथा चुंबकीय क्षेत्रों का अध्ययन करती है। यह भारत की सबसे बड़ी और आधुनिक सौर दूरबीन सुविधा है। इसके अलावा गॉन्ग जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं आंतरिक संरचना और चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन कर रही हैं।
सूर्य के रहस्यों को पूरी तरह समझने के लिए केवल जमीनी प्रेक्षण पर्याप्त नहीं हैं। भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन आदित्य एल-1 के आंकड़ों के साथ उदयपुर वेधशाला के ग्राउंड-बेस्ड प्रेक्षणों का समन्वय स्थापित किया जा रहा है, इससे सौर घटनाओं का 24 घंटे निगरानी संभव हो सकी है।
युवाओं और शोधार्थियों के लिए अवसर
वेधशाला न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध का केंद्र है, बल्कि देश और प्रदेश के विद्यार्थियों के लिए एक बड़ा अकादमिक मंच भी बनी हुई है। देश भर के प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से भौतिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा साइंस और गणित के विद्यार्थी यहां इंटर्नशिप और शोध के लिए आते हैं। कई वैज्ञानिक और प्रोफेसर, जो आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्यरत हैं, अपने कॅरियर की शुरुआती प्रेरणा इसी वेधशाला से जोड़ते हैं। आने वाले समय में युवाओं को स्पेस साइंस और आधुनिक ऑब्जर्वेशनल टेक्नोलॉजी से जोड़ने के प्रयास और तेज किए जाएंगे।