
उदयपुर. प्रदेश में घूमने आने वाले पर्यटकों का 99 फीसदी से ज्यादा हिस्सा घरेलू यानी भारतीय सैलानियों का है। साल 2025 में 25 करोड़ से ज्यादा पर्यटक आए और 2026 के शुरुआती 6 महीनों में 10.8 करोड़ से ज्यादा टूरिस्ट पहुंच चुके हैं। सिर्फ 0.2 फीसदी यानी करीब 8.4 लाख विदेशी पर्यटक पहुंचे। विदेशी पर्यटकों की संख्या में तेजी से गिरावट और भारतीय पर्यटकों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। जयपुर-उदयपुर जैसे हैरिटेज शहरों में सालाना 25 से 40 लाख देशी पर्यटक पहुंच रहे हैं। भारतीय घूमने तो निकल पड़े हैं, लेकिन क्या भारतीयों को घूमना आता है। पिछले 5 साल में घरेलू पर्यटक 2.5 गुना बढ़े और हमारी झीलें, जंगल और महलों की खूबसूरती, स्वच्छता तेजी से घट रही। इन पर खतरा दो गुना बढ़ा। सवाल उठता है कि क्या भारतीयों के पास टूरिज्म लिटरेसी (पर्यटन साक्षरता) है।
क्या है टूरिज्म लिटरेसी
पर्यटन का अर्थ केवल घूमना, ट्रैकिंग, हाइकिंग ही नहीं है बल्कि इससे अलग है। एक पर्यटक जब किसी शहर में घूमने जाता है तो उसको बदले में कुछ देकर आता है। वह क्या देकर जाएगा यह तय करती है उसकी टूरिज्म लिटरेसी। टूरिज्म लिटरेसी यानी किसी भी नए शहर में जाने से पहले वहां के ट्रैफिक नियम, संस्कृति, विरासत, ईको-सेंसिटिविटी, नागरिक प्रोटोकॉल और डू एंड डोन्ट्स का सामान्य ज्ञान होना है। भारतीय सैलानियों में टूरिज्म साक्षरता की भारी कमी है।
तीन उदाहरणों से समझें टूरिज्म निरक्षरता का असर
1. स्मारकों के सम्मान की समझ नहीं
उदयपुर के हैरिटेज म्यूजियम से लेकर अन्य ऐतिहासिक स्मारकों की स्थिति यह है कि प्रबंधन को अब हर महत्वपूर्ण कमरे में अलग से कर्मचारी तैनात करने पड़ रहे हैं। इसका कारण यह है कि पढ़े-लिखे सैलानी सदियों पुरानी दुर्लभ पेंटिंग्स को हाथ लगाकर, ऐतिहासिक कुर्सियों-झूलों पर बैठ जाना और मनाही के बावजूद दीवारों पर नाम लिख देना जैसी कृत्य कर रहे हैं और ये घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
2. 70 फीसदी चालान बाहर के वाहनों के
टूरिस्ट जब शहर में एंट्री लेते हैं तो प्रायः उनके पास शहर के ट्रैफिक नियमों की सामान्य जानकारी भी नहीं होती। कहां वाहन पार्क करने हैं, नो एंट्री जोन कौन सा है, कौन सा रास्ता वन-वे है। आंकड़े बताते हैं कि प्रमुख पर्यटक जोन्स में ट्रैफिक नियमों की अवहेलना के 70 फीसदी चालान बाहर से आने वाले वाहनों के कटते हैं। उदयपुर-जयपुर जैसे तंग गलियों वाले शहरों में जाम की स्थिति में लगातार बजते हॉर्न ध्वनि प्रदूषण बढ़ा रहे हैं।
3. ईको-साइट्स पर प्लास्टिक और कचरा
फतहसागर, पिछोला और बड़ी झील के किनारे हों या शहर के नए ऑफ-बीट डेस्टिनेशंस जैसे रायता हिल्स और बाहुबली हिल्स। शाम ढलने के बाद वहां से टूरिस्ट हटते हैं तो ढेर सारी प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट और गंदगी के ढेर छोड़ जाते हैं। ईको सेंसेटिव जोन में देर रात तक शराब पीना, लाउड म्यूजिक बजाना और अनियंत्रित कैंपिंग तेजी से बढ़ रही है। इसके कारण उन जगहों का पूरा ईको सिस्टम बिगड़ गया है। साथ ही ये घटनाएं वन्य जीवों के लिए खतरा बन रही हैं। पर्यटन विभाग को अब डर सताने लगा है कि यदि पर्यटकों का यही रवैया रहा तो प्राकृतिक धरोहर को कचरे का ढेर बनने में वक्त नहीं लगेगा।
इकोनॉमिक बूम या एनवायरनमेंटलबर्डन?
घरेलू पर्यटन से देश को विदेशी मुद्रा का अर्जन नहीं होता। इसमें धन केवल देश के भीतर एक से दूसरी जेब में जाता है। निरक्षर पर्यटन से शहर को आर्थिक रूप से जो मामूली लाभ मिलता है, उसकी तुलना में सफाई, जल प्रदूषण और प्राकृतिक नुकसान के रूप में जो पर्यावरणीय बोझ झेलना पड़ता है, वह कहीं अधिक गंभीर है। शहर पर जो एनवायरनमेंटल बर्डन और सॉलिड वेस्ट का भार पड़ता है, उसे संभालने में स्थानीय निकाय के संसाधन कम पड़ जाते हैं।
इसके अलावा पर्यटक लगातार स्थानीय संस्कृति, नियमों और मर्यादाओं की अनदेखी करते हैं। स्थानीय मर्यादाओं जैसे धार्मिक स्थलों के ड्रेस कोड, फोटोग्राफी और अन्य प्रतिबंधों की अवहेलना करते हैं। इससे कल्चरल व सिविक क्लैश बढ़ रहे हैं। धार्मिक स्थलों पर नियम और कड़े करने पड़ रहे हैं।
पाठ्यक्रम और नीति में जिम्मेदार पर्यटन की जरूरत
प्रो. मीरा माथुर का मानना है कि स्कूलों के स्तर पर पर्यावरण शिक्षा के साथ-साथ रिस्पॉन्सिबल टूरिज्म को भी पढ़ाई और समझ का हिस्सा बनाया जाए। जब तक सैलानी आगे बढ़कर एक लिटरेट टूरिस्ट नहीं बनेगा, तब तक हमारे पर्यटन स्थलों की समस्याएं बढ़ती ही रहेंगी। हमें एक सिस्टम बनाना पड़ेगा कि शहरों में पर्यटक की एंट्री के साथ ही उसे यह बता दिया जाए कि आपको यहां क्या करना चाहिए और क्या नहीं। शहर में पर्यटकों की बढ़ने वाली आबादी को दूसरी जगहों तक भेजने के लिए अरावली के आस- पास नए जोन तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन निरक्षर पर्यटकों के वहां पहुंचने से उन जगहों पर भी खतरा बढ़ने की आशंका बढ़ गई है।
स्थानीय बनाम पर्यटक
हाल ही बांसवाड़ा के चाचा कोटा में स्थानीय लोगों की पर्यटकों से झड़प हुई। स्थानीय लोग इस बात से नाराज थे कि पर्यटक देर रात तक शराब के नशे में तेज म्यूजिक चला रहे थे और समझाने पर भी नहीं माने, वहीं इसी तरह सास-बहू मंदिर और ऐतिहासिक किलों में पर्यटकों के व्यवहार और पहनावे के कारण कई बार स्थानीय बनाम पर्यटक जैसी स्थितियां बन जाती हैं।