
सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास इको-सेंसिटिव जोन
उदयपुर. सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण के मामले दायर याचिकाओं को हाईकोर्ट ने खारिज कर यूडीए को अनाधिकृत निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के लिए पूरी तरह स्वतंत्र कर दिया। न्यायाधीश समीर जैन ने निर्णय में कहा कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील और प्रतिबंधित क्षेत्र में सिर्फ पुरानी जमीन संबंधी मंजूरी, होटल-रिसॉर्ट का पहले से संचालित होना, निर्माण में करोड़ों रुपए लग जाना या आवेदन पर समय पर फैसला नहीं होने से मिलने वाली डीम्ड परमिशन के आधार पर नया निर्माण वैध नहीं माना जा सकता। पहले निर्माण कर लेना और बाद में मंजूरी की उम्मीद करना कानून में संरक्षण का आधार नहीं बन सकता। हाईकोर्ट ने संबंधित निर्माणों को लेकर उदयपुर विकास प्राधिकरण की ओर से सीलिंग और ध्वस्तीकरण संबंधी कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
न्यायालय ने यह निर्णय दुर्गा शंकर उर्फ दुर्गेश बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य के खिलाफ दायर रिट पर दिया। न्यायालय ने इसी विषय से संबंधित अन्य याचिकाओं को भी शामिल कर सुनवाई की थी। याचिकाएं सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से लगे संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण और उन पर कार्रवाई को लेकर दायर की गई थीं।
सज्जनगढ़ क्षेत्र में सामान्य भवन अनुमति काफी नहीं
हाईकोर्ट ने निर्णय में कहा कि सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास लागू विशेष पर्यावरणीय नियमों को सामान्य भवन निर्माण नियमों से अलग नहीं किया जा सकता। अभयारण्य से लगे प्रतिबंधित क्षेत्र में किसी निर्माण के लिए केवल सामान्य भवन अनुमति या विकास संबंधी मंजूरी पर्याप्त नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंध लागू हैं तो वहां निर्माण के लिए उन नियमों के तहत जरूरी स्वीकृतियां भी लेनी होंगी। इनके बिना किया निर्माण सिर्फ इस आधार पर वैध नहीं हो सकता कि संबंधित व्यक्ति के पास जमीन के पुराने दस्तावेज या किसी अन्य कानून के तहत अनुमति मौजूद है।
2017 की अधिसूचना और जोनल मास्टरप्लान अहम
सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन के लिए 13 फरवरी 2017 की पर्यावरणीय अधिसूचना महत्वपूर्ण आधार है। क्षेत्र के लिए जोनल मास्टर प्लान तैयार किया। राज्य सरकार ने 22 अक्टूबर 2024 को इस जोनल मास्टर प्लान को मंजूरी दी। इसमें क्षेत्र की गतिविधियों को मुख्य रूप से प्रतिबंधित, विनियमित और अनुमत/प्रोत्साहित श्रेणियों में बांटा। इसका उद्देश्य अभयारण्य और उसके आसपास के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करना है, जिनसे प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीव क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
डीम्ड परमिशन से पर्यावरणीय रोक खत्म नहीं होगी
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा डीम्ड परमिशन को लेकर है। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क रखा कि संबंधित प्राधिकरण ने आवेदन पर निर्धारित समय में फैसला नहीं किया, इसलिए मांगी अनुमति के सिद्धांत के आधार पर निर्माण जारी रखने का अधिकार बनता है। न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आवेदन पर समय पर निर्णय नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि ऐसा निर्माण भी स्वतः मंजूर मान लिया जाए, जिस पर विशेष पर्यावरणीय नियमों के तहत रोक है।
पुराना होटल या रिसॉर्ट है तो हर विस्तार वैध नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी जमीन पर पहले से होटल, रिसॉर्ट या अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान चल रहा है तो इससे वहां भविष्य में किए जाने वाले हर निर्माण को स्थायी छूट नहीं मिल जाती। बाद में किया गया नया निर्माण या विस्तार उस समय लागू नियमों के अनुसार ही जांचा जाएगा और जहां आवश्यक हो वहां संबंधित अनुमतियां लेनी होंगी।
करोड़ों का निवेश और 90 फीसदी निर्माण भी नहीं बना बचाव
मामले में दलील दी गई कि निर्माण में भारी निवेश हो चुका है और काम करीब 90 प्रतिशत पूरा हो गया। हाईकोर्ट ने इसे भी राहत का आधार नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी निर्माणकर्ता ने अनुमति मिलने की उम्मीद में पैसा खर्च किया है, इससे उसे उस निर्माण को जारी रखने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। इसी तरह निर्माण काफी आगे बढ़ चुका हो तो भी वह अपने आप वैध नहीं हो जाता।
दूसरों ने भी बना रखा, यह भी कानूनी बचाव नहीं
याचिकाकर्ताओं की ओर से आसपास मौजूद अन्य निर्माणों का उदाहरण भी दिया। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अन्य व्यक्ति ने नियमों का उल्लंघन किया है या किसी मामले में कार्रवाई नहीं हुई है, तो उससे दूसरे व्यक्ति को भी नियम तोड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता। हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल भवन अनुमति या जमीन के विवाद के रूप में नहीं देखा। अदालत ने पर्यावरण संरक्षण के व्यापक सिद्धांत पर जोर दिया। अदालत ने प्राकृतिक संसाधनों को लेकर पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत का भी उल्लेख किया। इसका मतलब है कि प्राकृतिक संसाधन केवल निजी व्यावसायिक उपयोग की वस्तु नहीं हैं। सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे इनकी रक्षा करें।
Updated on:
07 Sept 2026 06:47 pm
Published on:
07 Sept 2026 06:47 pm
