चुनावी थकान उतारने के लिए घर पर ही आराम करते रहे अफसर
नागदा. लोकसभा चुनाव के एक दिन बाद सोमवार को शासकीय कार्यालय में सन्नाटा पसरा रहा। ऑफिस तो खुले, लेकिन अफसर नदारद मिले। कुछ ऑफिसों के दरवाजें भी बंद पाए गए। कई लोग कार्य के लिए ऑफिस पहुंचे, लेकिन बैरंग घर लौटे। अफसर लोग चुनावी थकान मिटाने के लिए घर पर ही रहे। कुछ अफसरों ने तो मोबाइल भी बंद कर लिए। कई अधिकारियों ने फोन भी रिसीव नहीं किया। शिक्षा विभाग में तो कई अफसरों ने तड़ी मार दी। राजस्व, एसडीएम कार्यालय लावारिस मिले। हालांकि शासन ने चुनाव के दूसरे दिन कोई छुट्ïटी की घोषणा नहीं की।
नगर पालिका में भी छाई रही विरानी
नगर पालिका कार्यालय का भी हाल कुछ ऐसा ही नजर आया। ऑफिस तो खुला लेकिन सीएमओ से लेकर स्टेनों रूम के दरवाजे बंद मिले। इस कारण कामकाज के लिए पहुंचे लोगों को परेशान होकर बैरंग घर लौटना पड़ा।
खाद्य विभाग पर मिला ताला
जनता से जुड़े महत्वपूर्ण खाद्य विभाग के कार्यालय पर दिनभर ताला लटका मिला। कई लोग कार्यालय पहुंचे लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। कोई जिम्मेदार कर्मचारी भी ऑफिस नहीं पहुंचा था।
तहसीलदार व नायब तहसीलदार के कक्ष पर ताला
चुनाव में नागदा-खाचरौद विधानसभा क्षेत्र का जिम्मा एसडीएम आरपी वर्मा को भी था। उन्हे सहायक निर्वाचन अधिकारी बनाया गया था। तहसीलदार व नायब तहसीलदार को भी निर्वाचन का दायित्व दिया गया था। सोमवार को ये तीनों अधिकारी कार्यालय नहीं पहुंचे। चुनाव की वजह से अफसरों की अनुपस्थिति के अलावा कर्मचारी भी नदारद दिखे।
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उद्योग व श्रमिकों के बीच होने वाला है पांच सालाना समझौता
पुरानी मांगें अधूरी, दूसरे समझौते की तैयारी
नागदा. ग्रेसिम उद्योग प्रबंधन व श्रमिकों के बीच होने वाले पांच सालाना समझौते को लेकर कई माह पूर्व ही चर्चाओं का दौर शुरू हो गया था। लेकिन आचार संहिता के चलते जनवरी माह में होने वाला समझौता पांच माह लेट हो चुका है। पांच साल पहले हुए उद्योग व श्रमिकों के बीच हुए समझौते के कई फैसले मनवाने के लिए एक कांग्रेस नेता ने सहायक श्रमायुक्त का सहारा लिया है। इसके बावजूद आधा दर्जन मांगें अब ऐसी है, जिन पर उद्योग समूह की ओर से काम करना बाकी है।
जनवरी माह में होने वाले समझौते के पहले सभी ट्रेड यूनियन अपने-अपने मांग पत्र तैयार करने और रणनीति बनाने में लग जाते है। इस बार भी श्रम संगठनों की ट्रेड यूनियनों ने अपना-अपना मांग पत्र तैयार कर उद्योग को सौंप दिया है। लेकिन उसमें फिर श्रमिकों की मांगों को ध्यान में नहीं रखा गया है। समझौते में इस बार दोनों राजनीतिक दलों के जवाबदार पद पर बैठे जनप्रतिनिधियों की बेरूखी नजर आ रही है। वहीं युवा नेता बसंत मालपानी श्रमिकों के हित में अपनी आवाज कई बार बुलंद कर चुके हंै। मालपानी की मांग है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया जाए इसके लिए सहायक श्रमायुक्त सहित मंत्रियों तक पत्र व्यवहार के माध्यम से मांग भी रख
चुके है, लेकिन उद्योग ने उनकी राह को कुचलने का प्रयास किया उसके बावजूद अपनी मांग पर अड़े हुए है।
दोनों पक्षों के बीच चल रही तारीख
समझौते के बावजूद उद्योग द्वारा अमल नहीं करने से श्रमिकों में अंदरूनी आक्रोश पनप रहा है। इधर श्रम संगठन व उद्योग समूह के बीच तारीखों का सिलसिला चल रहा है। लेकिन श्रम संगठन श्रमिकों का रवैया इस बार कुछ अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि समझौता उद्योग समूह के इशारे पर ही होगा।