वाराणसी

बेटों के रहते हुए भी बेटी व बहुओं ने कंधा देकर पूरी की मां की अंतिम इच्छा, शामिल हुई गांव की महिलाएं

मौत के बाद कराया गया नेत्रदान, समाज का मिथक तोडऩे के लिए काफी है वृद्ध महिला की कहानी
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Updated: 23 Jul 2018, 2:42 PM IST
Old mother funeral
Old mother funeral

वाराणसी. समाज का मिथक तोडऩे के लिए वृद्ध महिला ने मौत के बाद ऐसी मिसाल पेश की है जो लोगों को आईना दिखाने के लिए काफी है। वृद्धा की मौत के बाद बेटी व बहुओं ने मिल कर कंधा दिया। बेटी व बहु का साथ पूरी गांव की महिलाओं ने दिया। शवयात्रा में गावं की महिलाएं शामिल हुई और अंतिम संस्कार कर वृद्धा की सबसे बड़ी इच्छा पूरी की गयी।
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मां-बाप की मौत के बाद बेटा ही शव को कंधा देकर अंतिम संस्कार की सारी रस्म पूरी करता है। जबकि बेटे व बेटी दोनों ही समान होते हैं इसके बाद भी बेटियों को कंधा देने का हक नहीं मिला है। समाज की इसी परम्परा को तोडऩे का बीड़ा एक वृद्धा ने उठाया था। बनारस के चिरईगांव के बरियासनपुर निवासी संतोरा देवी (95) समाज को बेटी के हक के प्रति जागरूक करना चाहती थी। संतोरा देवी के पति की मौत सालों पहले हो चुका था। पति की मौत के बाद संतोरा देवी ने परिजनों से इच्छा जतायी थी कि जब उनकी मौत हो तो नेत्रदान कराने के बाद ही शव का अंतिम संस्कार किया जाये। उसी समय संतोरा देवी ने परिजनों से कहा था कि मौत के बाद उसके शव को बेटी ही कंधा दे। जिससे समाज का यह मिथक टूट सके कि बेटी शव को कंधा नहीं दे सकती है। संतोरा देवी की मौत के बाद उनकी इकलौती बेटी पुष्पावती पटेल ने मां की अंतिम इच्छा पूरा करने का बीड़ा उठाया। संतोरा देवी की दो पुत्र भी है जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था की बात कहते हुए खुद शवयात्रा निकालने की बात कही थी लेकिन बेटी ने कहा कि मां की अंतिम इच्छा है इसलिए शव को कंधा वह खुद देगी। बेटी का साथ घर की बहुओं ने दिया। बेटी व बहु का हौसला देख कर गांव की महिलाएं भी सामने आ गयी। परिजनों ने सबसे पहले संतोरा देवी का नेत्रदान करा कर पहला सपना पूरा कराया। इसके बाद बेटी व बहुओ ने मिल कर मृतका को कंधा दिया। शवयात्रा में गांव की महिलाएं भी शामिल हुई। इससे साफ संदेश गया कि बेटा व बेटी समान होते हैं। मां-बाप को दोनों ही कंधा दे सकते हैं।
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अन्य लोगों के लिए मिसाल बनी गांव की महिलाएं
अन्य लोगों के लिए गांव की महिलाएं मिसाल बन गयी है। बेटे व बेटी को बांटने वाली सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए जिस तरह से शवयात्रा में महिलाएं शामिल हुई है वह साफ संदेश देता है कि अब उन परम्पराओं को बदलना होगा, जिससे बेटे व बेटी में भेद होता है।
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