आज भी आरंग में मोरध्वज की कहानी बेहद प्रसिद्ध है। यहां शहर में उपस्थित मंदिर बेहतरीन वास्तुकला की दृष्टि से बेहद उत्कृष्ट है।
नई दिल्ली। हमारे देश में देखने लायक कई सारी चीजें हैं। कई जगहें ऐसी भी हैं जो शायद उस हद तक मशहूर नहीं है, लेकिन खूबसूरती के मामले में किसी से कम नहीं है।
एक ऐसी ही जगह है आरंग जो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 11 वी सदीं के भांडदेवल मंदिर और महामाया मंदिर की वजह से आरंग लोगों के बीच काफी मशहूर है।
द्वापर युग में यह शहर मोरध्वज नामक किसी राजा की नगरी हुआ करती थी। राजा मोरध्वज श्रीकृष्ण के परम भक्तों में से एक थे।कृष्ण भी मोरध्वज को अपना परम भक्त मानते थे।
एकबार श्रीकृष्ण अर्जुन को मोरध्वज की भक्ति पर यकीन दिलाने के लिए उनकी नगरी जा पहुंचे। भगवान कृष्ण और अर्जुन ऋषि का वेश धारण किए हुए थे।
भगवान कृष्ण ने राजा मोरध्वज के पास जाकर कहा कि मेरा शेर बहुत भूखा है। कृष्ण ने यह भी कहा कि यह सिर्फ इंसान का मांस ही खाता है। ऋषि के ऐसा कहने पर राजा मोरध्वज ने कहा कि मेरा मांस ले लो। इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि मेरा शेर सिर्फ बच्चे का मांस ही खाता है। इस पर राजा ने अपने बेटे का मांस देने की बात कही।
भगवान कृष्ण ने इस बात की शर्त रखी कि ध्यान रहे मांस काटते वक्त दोनों पति-पत्नी में से किसी की भी आंखों में आंसू नही आने चाहिए। राजा मोरध्वज ने अपने दिल पर पत्थर रख ऐसा ही किया। उन्होंने बिना रोए अपने बेटे का मांस ऋषि के शेर को खिला दिया।
भगवान कृष्ण राजा मोरध्वज से काफी खुश हुए। राजा भगवान द्वारा ली गई परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण हो गए। भगवान कृष्ण ने राजा मोरध्वज के बेटे को पुनर्जीवित कर दिया और इसके साथ ही मोरध्वज को अपने परम भक्त का पद दे दिया।
आज भी आरंग में मोरध्वज की कहानी बेहद प्रसिद्ध है। यहां शहर में उपस्थित मंदिर बेहतरीन वास्तुकला की दृष्टि से बेहद उत्कृष्ट है। आरंग को मंदिरों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। अगर आप भी कभी छत्तीसगढ़ जाएं तो आरंग शहर की सैर करना न भूलें।