मूंगा का रंग इस बात पर भी निर्भर करता है कि समुद्र में कितनी गहराई में वह पाया जाता है।
नई दिल्ली। कुंडली में जब किसी ग्रह की स्थिति खराब चल रही होती है तो उसे सुधारने के लिए ज्योतिषी कुछ उपाय बताते हैं और साथ ही रत्न धारण करने के लिए कहते हैं। इन्हीं रत्नों में से एक है मूंगा। इसे मंगल ग्रह का प्रतिनिधि रत्न माना जाता है।
इसीलिए यदि कोई व्यक्ति मंगल दोष से पीड़ित है तो उसे मूंगा पहनने के लिए कहा जाता है। अब क्या आपने कभी सोचा है कि मूंगा कहां से मिलता है? आज हम आपको इस रत्न से संबंधित कुछ ऐसी बातें कहेंगे जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि मूंगा लाल रंग का होता है, लेकिन इसके अलावा मूंगा गेरुआ, सफेद,सिंदूरी काले रंग का भी होता है। दरअसल, मूंगा का रंग इस बात पर भी निर्भर करता है कि समुद्र में कितनी गहराई में वह पाया जाता है। गहराई बढ़ने के साथ मूंगे का रंग हल्का होता जाता है और जैसे जैसे गहराई घटती है तो यह गाढ़े रंग का होता जाता है।
आपको बता दें कि मूंगा एक जैविक रत्न है और ऐसा इसलिए क्योंकि मूंगा आईसिस नोबाइल्स नामक एक समुद्री कीड़े का घर होता है। कीड़ा अपने रहने के लिए इसे बनाता है। समंदर में 6 सौ से 7 सौ फीट नीचे गहरी चट्टानों में कीड़े द्वारा इस घर का निर्माण किया जाता है।
आईसिस नोबाइल्स के घरों को मूंगे की बेल या मूंगे का पौधा के नाम से भी बुलाते हैं। हालांकि यह कोई पेड़ या पौधा नहीं होता, सिर्फ दिखने में यह एक वनस्पति जैसा लगता है। इस वजह से लोग इसे मूंगे का पेड़ कहते हैं। इस पौधेनुमा घर में कोई पत्ता नहीं होता, सिर्फ शाखायें होती हैं। इनकी लंबाई 1 से 2 फुट तक होती है और 1 इंच के आसपास इनकी मोटाई होती है।
मूंगा जब परिपक्व हो जाता है तो इसे मशीनों की सहायता से निकाला जाता है। इसके बाद कटिंग कर मनचाहा आकार दिया जाता है। यह हिंद महासागर इटली, जापान के अलावा भूमध्य सागर के तटवर्ती देश अल्जीरिया, सिगली के कोरल सागर और ईरान की खाड़ी में भी पाया जाता है।
मूंगा कैल्शियम कार्बोनेट का केमिकल स्ट्रक्चर होता है जिसे पहनने से खून साफ होता है और दिल की बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है।