अजब गजब

कलियुग का खात्मा करने के लिए ​यहां तिल-तिल कर बढ़ रहे हैं नंदी, रहस्यों का पता लगाने में वैज्ञानिक भी हुए फेल

मंदिर परिसर में एक भी कौवा देखने को नहीं मिलेगा।
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Feb 14, 2019
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कलियुग का खात्मा करने के लिए ​यहां तिल-तिल कर बढ़ रहे हैं नंदी, रहस्यों का पता लगाने में वैज्ञानिक भी हुए फेल

नई दिल्ली। धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कहानियों में कलियुग के बारे में कई सारी बातों का वर्णन किया गया है। कलियुग के अंत के बारे में भी तरह-तरह की बातें बताई गई हैं। धरती पर महाप्रलय आने की बात नंदी देवता के जीवित होने पर भी निर्भर है। ऐसा कहा जाता है कि कलियुग के अंत में नंदी महाराज जीवित हो उठेंगे और धरती का विनाश हो जाएगा। शायद यही वजह है कि देश में इस स्थान पर नंदी देव धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।

आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में यांगती उमा माहेश्वर मंदिर ? में नंदी देव की एक प्रतिमा है और चौंकाने वाली बात तो यह है कि रहस्यमयी तरीके से इस प्रतिमा की आकृति में लगातार वृद्धि होती जा रही है। इस वजह से कुरनूल जिले का यह मंदिर काफी मशहूर है। यहा स्थापित नंदी महाराज की मूर्ति की आकृति में हर 20 साल में करीब एक इंच की बढ़ोत्तरी होती है।

पहले मंदिर में आने वाले भक्त नंदी की परिक्रमा बड़ी ही सहजता से कर लेते थे, लेकिन अब ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं हो पाता है। मूर्ति की बढ़ती हुई आकृति को देखते हुए मंदिर प्रशासन की ओर से एक पिलर को भी वहां से हटा दिया गया है ताकि जगह बन सकें।

15 वीं शताब्दी में संगमा राजवंश के राजा हरिहर बुक्का ने इसे बनवाया था। कहा जाता है कि अगत्स्य ऋषि इस स्थान पर वेंकटेश्वर भगवान का मंदिर बनाने की चाह रखते थे, लेकिन मूर्ति स्थापना के दौरान मूर्ति के पैर के एक अंगूठे का नाखून टूट गया था।

ऐसा होने के पीछे की वजह को जानने के लिए परेशान ऋषि अगत्स्य ने शिव जी की तपस्या की और फलस्वरूप भोलेनाथ के आशीर्वाद से अगत्स्य ऋषि ने उमा माहेश्वर और नंदी की स्थापना मंदिर में की।

अब वर्तमान समय में नंदी देव के मूर्ति की लगातार बढ़ते साइज को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इस पर रिसर्च किया। इसमें पता चला कि नंदी देव को मूर्ति को बनाने के लिए जिस पत्थर का इस्तेमाल किया गया है वह लगातार बढ़ती ही रहती है। यही उस पत्थर की प्रकृति है। अब बात करते हैं मंदिर के एक और रहस्य के बारे में।

मंदिर परिसर में एक छोटा सा तालाब है जो पुष्करिणी के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें नंदी के मुख से पानी निंरतर गिरता रहता है। यह बात अब तक किसी को नहीं मालूम कि आखिर इसमें पानी कहां से आता है। लोगों का कहना है कि इसी पुष्करिणी में स्नान कर ऋषि अगत्स्य ने महादेव की आराधना की थी।

इतना ही नहीं मंदिर में जाने पर एक और चौंकाने वाली बात सामने आएगी और वह ये कि मंदिर परिसर में एक भी कौवा देखने को नहीं मिलेगा। मान्यताओं के अनुसार, ऋषि अगत्स्य ने कौवों को मंदिर ने कभी न आने का श्राप दिया था। ऐसा उन्होंने इसलिए किया था ताकि कौवों की कोलाहल से उनकी तपस्या में कोई विघ्न न पड़े।

Published on:
14 Feb 2019 11:31 am
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