मैं स्वयं उस अस्थमा से हलकान होती टूटी सांसों के बीच, गहरी साँस लेने, फिर लौट आती हूँ उस खिड़की पर जहाँ से दुनिया कुछ खूबसूरत नज़र आती है।
- डॉ. विमलेश शर्मा
चाह कर भी नहीं टिक पाती बहुत देर तक आँकड़ों से उलझी गणित पर, बेमतलब की सियासी हलचलों पर, दर्द को छुपाती भीड़ की बनावटी मुस्कराहटों पर, कभी न पुरे होने वाले वादों की मुनादी पर, साहित्यिक ठेकेदारों की राजनीति पर, किसी भी तरह पुरस्कार पाने की ठेलम-पेल पर। बीते साल कोई और वीडियो चर्चा में था, इस साल फिलवक्त कोई और है। मन तो बहुत कसमसाता है ऐसी घटनाओं पर, अंदर ही अंदर बैचेनी होती है, अजीब सी घुटन होती है और मैं स्वयं उस अस्थमा से हलकान होती टूटी सांसों के बीच, गहरी साँस लेने, फिर लौट आती हूँ उस खिड़की पर जहाँ से दुनिया कुछ खूबसूरत नज़र आती है।
लौटने की रूलाई को महसूस करते हुए भी यूँ लौटना ही होता है अक़्सर! और हम लौटते हैं, दुनियादारी से दूर अपने आस-पास, चिड़ियाँ की चहचहाहट सुनने, पानी पर बिछलती तरंगों का राग सुनने, दरगाह के रास्ते किसी मस्त कलंदर की सिकंदरी सुनने... ये लौटना वाकई लौटना होता है कभी अपने से परे तो कभी अपने तक, तमाम विशेषण और संज्ञाओं से परे अनाम सर्वनाम तक!
मैं लौटती हूँ यूँ फिर कुछ जी लेने, किसी वर्जित बगिया में किसी फल के उगने को देखने, फूलों के उन रंगों को टटोलने जिस पर जाने कौन अहर्निश कूची फेरता रहता है। मन उदास हो तो बाहर कांधे नहीं तलाशने होते भीतर को ही रवां किया जाता है। इस मरम्मत में बहुत सी चोटों की तीमारदारी करनी होती है। बीते जीवन की मिट्टी पर अपने ही कदमों को देखना होता है कि वो कौन था जो हाथ पकड़े इतनी दूर तक ले आया था। वो कोई तो था जो चिलचिलाती धूप के आते ही मेरे माथे पर एक बादल ला धरता है। इस अनथक यात्रा के दौरान कभी रूलाई से तो कभी हँसी से गाल लाल होते रहे पर हम बढ़ते रहे, सतत! उस अंतिम छोर की ओर...।
फेसबुक वाल से साभार