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पूर्वोत्तर में कमल खिलने के मायने

ऐसा क्या हुआ कि उसी भाजपा ने सबसे ईमानदार राजनेता की छवि रखने वाले माणिक सरकार के पच्चीस साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका।

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Sunil Sharma

Mar 06, 2018

bjp in northeast

bjp flag in northeast

- प्रो. आर.के. सत्पथी, टिप्पणीकार

देश के इतिहास में यह पहली बार है जब पूर्वोत्तर के राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहे। केन्द्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की त्रिपुरा में पहली जीत ने इन चुनावों को राजनीतिक गलियारों की सुर्खियां बना दिया। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि पिछले चुनावों में त्रिपुरा में भाजपा ने पचास विधानसभा क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। और, उन ५० में से ४९ पर भाजपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थीं। वहीं, अब पांच साल बाद हुए चुनावों में ऐसा अचानक क्या हुआ कि उसी भाजपा ने सबसे ईमानदार राजनेता की छवि रखने वाले माणिक सरकार के पच्चीस साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका। आखिर माणिक सरकार ने क्या गलत कर दिया?

त्रिपुरा चुनावों से एक बात तो साबित होती है कि सिर्फ नेतृत्व के पाक साफ और अच्छी छवि का होने से ही मतदाताओं को लुभाया नहीं जा सकता। त्रिपुरा में बदहाल सडक़ें, बढ़ती बेरोजगारी, पटरी से उतरी स्वास्थ्य व्यवस्था, गरीबी और सातवें वेतन आयोग का लागू न होना मतदाताओं की नाराजगी के प्रमुख कारण रहे। सीपीआई (एम) के कैडरों पर भी भाई-भतीजावाद के अरोप लगते रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यह भी देखने में आ रहा है कि लेफ्ट सरकारों की कार्यप्रणाली और रीति-नीति से मतदाताओं का मोहभंग होता जा रहा है।

मतदाताओं की नाराजगी को भांपते हुए भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपना संगठन मजबूत किया। इस काम के लिए पार्टी के करीब पचास हजार कार्यकर्ता लम्बे समय से सक्रिय थे। पार्टी के दिग्गज नेता पिछले दो वर्षों से समय-समय पर राज्य का दौरा कर माणिक सरकार के खिलाफ रणनीति पर काम करते रहे हैं। पार्टी के रणनीतिकार जानते थे कि लेफ्ट से मुकाबले के लिए उन्हें अपना संगठन धीरे-धीरे ही खड़ा करना होगा। साथ ही नेताओं ने यह भी सुनिश्चित किया कि संगठन में आपसी कलह न पैदा हो और इस काम को पार्टी की यूथ ब्रिगेड ने बखूबी निभाया।

महत्वपूर्ण यह रहा कि पार्टी ने अपनी कार्यप्रणाली को सीमावर्ती राज्य के अनुकूल ढाल लिया। चुनाव से पहले ही भाजपा ने आदिवासी सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी और यह लेफ्ट के वोट बैंक में सबसे बड़ी सेंध थी। यह साफतौर पर समझा जा सकता है कि भाजपा ने अपनी जीत की रूपरेखा बहुत पहले ही तैयार कर ली थी और वे उसे हासिल करने में कामयाब भी रहे। दूसरी तरफ लेफ्ट जहां आत्मसंतुष्टि की भावना लिए हुए थी तो कांग्रेस ने भाजपा के आक्रामक चुनाव प्रचार के सामने पहले ही हथियार डाल दिए थे। पूर्वोत्तर के बाकी दो राज्यों- नगालैंड और मेघालय के परिणमों की बात करें तो यहां भी भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ अच्छा प्रदर्शन किया। और, यही उनकी योजना भी थी।

जहां त्रिपुरा परिणामों ने राजनीतिक पंडितों को निशब्द कर दिया, वहीं इन दोनों राज्यों ने भी थोड़ा बहुत हैरान तो किया। यह सच है कि नगालैंड में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी लेकिन उसमें भाजपा की धमक कम थी। इस बार भाजपा ने अपनी स्थिति पहले से बेहतर की है। क्षेत्रीय दलों के चुनाव बहिष्कार करने के बावजूद भाजपा सभी को चुनावी मैदान तक खींच लाने में कामयाब रही। जिस शांति समझौते के खुलासे के ना होने से चुनावों का बहिष्कार किया जा रहा था भाजपा ने अपनी सफल रणनीति से उस मुद्दे को ही गायब कर दिया।

मेघालय में गोवध पर प्रतिबंध एक तरह से भाजपा के लिए नुकसान भरा कदम समझा जा रहा था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। कोयला और चूना पत्थर खदानों में लगा प्रतिबंध लोगों के लिए गोवध पर प्रतिबंध से ज्यादा बड़े मुद्दे हैं। मेघालय में सत्तासीन कांग्रेस मुख्यमंत्री मुकुल संगमा से मतदाताओं की नाराजगी के चलते नौ सीटें खोकर त्रिशंकु की हालात में आ गई है। दूसरी ओर, वरिष्ठ नेता पीए संगमा के निधन से उपजी सहानुभूति लहर के चलते नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) १९ सीटें जीतकर सत्ता की दावेदार हो गई है। पड़ोसी राज्य नगालैण्ड में मतदाताओं को राष्ट्रीय दलों से ज्यादा क्षेत्रीय दलों पर ही भरोसा रहा है। भाजपा ने यहां जो भी सफलता अर्जित की है, वह नगा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) से गठबंधन के चलते ही संभव हुई है।

कहा जा रहा है कि इन राज्यों के परिणामों का केन्द्र की राजनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि संसद में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा की चुनाव जीतने की रणनीति एक बार फिर सफल रही और उसके कार्यकर्ता नवीन उत्साह से लबरेज हैं। जल्द ही कर्नाटक और उसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनावों में भाजपा कार्यकर्ता एकजुट होकर जीत सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे। कांग्रेस के लिए यह परिणाम निराशाजनक नहीं कहे जा सकते लेकिन आने वाली चुनौतियों को देखते हुए पार्टी को अपनी रीति-नीति पर आत्ममंथन करने की जरूरत है। उसके नेताओं को जमीनी स्तर पर जाकर संगठन को मजबूत कर कार्यकर्ताओं का खोया आत्मविश्वास लौटाना होगा।