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आत्ममंथन का वक्त

सबसे प्राचीन पार्टी के पास अब कर्नाटक बचाने की चुनौती है। पार्टी यहां भी हार गई तो २०१९ के चुनाव में उसकी दावेदारी कमजोर हो जाएगी।

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Sunil Sharma

Mar 05, 2018

rahul gandhi

rahul gandhi party

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावी नतीजों की गूंज अभी शांत भी नहीं हो पाई थी कि पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावी परिणाम देश के सामने है। त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी ने २५ साल पुराने वामपंथी किले को ढहा दिया। ढाई दशक से त्रिपुरा में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभा रही कांïग्रेस राज्य में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। नगालैण्ड में भाजपा ने क्षेत्रीय दल के साथ मिलकर बहुमत हासिल कर लिया तो मेघालय में त्रिशंकु विधानसभा सामने आई है।

तीनों राज्यों में से त्रिपुरा के नतीजों ने देश को वाकई चौंका दिया। इसलिए क्योंकि पिछले चुनावों में एक सीट भी नहीं जीतने वाली भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर लगभग तीन चौथाई सीटें जीतने में कामयाब रहीं। प. बंगाल के बाद त्रिपुरा में वामपंभी दलों की करारी हार ने इस विचारधारा के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए। खासकर उस स्थिति में जब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की छवि देश के गिने-चुने ईमानदार नेताओं में होती हैं।

तीन राज्यों के नतीजे आने वाले महीनों में कर्नाटक विधानसभा चुनावों के नतीजों को प्रभावित करेंगे या नहीं, ये सवाल राजनीतिक गलियारों में महत्वपूर्ण हो चला है। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश हारने वाली कांïग्रेस मेघालय में भी बहुमत हासिल नहीं कर पाई। देश की सबसे प्राचीन पार्टी के पास अब कर्नाटक बचाने की चुनौती है। पार्टी अगर यहां भी हार गई तो २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनाव में उसकी दावेदारी कमजोर हो जाएगी।

एक के बाद एक चुनावों में हार रही कांग्रेस के अलावा गैर भाजपा दलों के सामने भी अगले लोकसभा चुनाव बड़ी चुनौती के रूप में आने वाले हैं। कांग्रेस के साथ-साथ वामदलों को भी समय के साथ बदलने की नई सोच विकसित करनी होगी। त्रिपुरा, नगालैण्ड में जीत के बावजूद भाजपा को भी अधिक खुश होने की जरूरत नहीं है।

राजस्थान और मध्यप्रदेश के उपचुनावों में मिली करारी पराजय उसके लिए आत्मचिंतन का अवसर होना चाहिए। अपनी हार के कारणों का पता लगाकर उसके अनुरूप रणनीति बनाने वाले राजनीतिक दल ही फायदे में रह सकते हैं। देखना यह होगा कि कौन दल कितनी ईमानदारी से अपना विश्लेषण करता है।