विवाह भारत मे सिर्फ परंपरा नही बल्कि सात जन्मों का बंधन है, यहाँ दाम्पत्य जीवन को आदर्श माना जाता है।
- डॉ. शिल्पा जैन सुराणा
विवाह भारत मे सिर्फ परंपरा नही बल्कि सात जन्मों का बंधन है। यहाँ दाम्पत्य जीवन को आदर्श माना जाता है पर यह चिंता की बात है कि भारत मे ये ढांचा चरमरा रहा है। दुख की बात है कि ये समस्या धीरे धीरे विकृत रूप ले रही है और हमारा ध्यान इस और नही जा रहा है। विवाह के पहले वर्ष के भीतर होने वाले तलाक और भी तेजी से बढे़ हैं। हालांकि भारत में अब भी तलाक की दर अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों के मुकाबले कम है, जहां लगभग 40 से 55 प्रतिशत विवाहों का अंत तलाक में हो रहा है।
यदि तलाक के आंकड़ों से आगे जाकर यह पूछा जाए कि कितने प्रतिशत दंपति आपसी संबंध को दोनों के लिए संतोषजनक तथा रचनात्मकता बढ़ाने वाला मानते हैं, तो आंकड़े और भी प्रतिकूल स्थिति बता सकते हैं, क्योंकि बहुत से वैवाहिक संबंधों में चाहे तलाक को टाल दिया जाए, पर ऐसी परेशानी बनी रहती है, जो न पति-पत्नी के लिए उचित है, न बच्चों के लिए। एक ओर पुरुष सत्ता व आधिपत्य के संबंधों को तोड़कर ***** आधारित समानता स्थापित करना जरूरी है। यह भी जरूरी है कि बदलाव प्रेम और सहृदयता के साथ आए। इसके लिए काफी प्रयास करने की जरूरत है। ऐसा बदलाव अपने आप तो आएगा नहीं। ये प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर जरूरी हैं, तो व्यापक सामाजिक स्तर पर भी ऐसे परामर्श और सामुदायिक कार्य जरूरी हैं, जो इस बदलाव में मददगार हों। इन उपेक्षित कार्यों की ओर समुचित ध्यान दिया जाए, तो तेजी से बदलते समाज में दुख-दर्द कम करने में बहुत मदद मिलेगी और साथ में समाज की रचनात्मक क्षमताएं भी बढ़ेंगी।
आजकल नव दंपतियों में प्रतिकूल स्थितियों और अचानक आए तनाव को संभालने की क्षमता उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। एक-दूसरे से छोटे-मोटे तालमेल करके किसी बिगड़ते संबंध को संभाल लेने की क्षमता कम हो रही है। स्वार्थ, जिद और अहंकार से ऊपर उठकर दीर्घकालीन संबंध प्रगाढ़ करने और परस्पर प्यार बढ़ाने की कला समाज को सीखनी पड़ेगी। साथ ही इसके लिए परिवार भी अपनी भूमिका निभाई। परम्पराओ को निभाना अलग बात है थोपना अलग बात है। इस बात को जितना जल्दी स्वीकार कर ले अच्छा रहेगा। थोड़ा सामंजस्य बिठाए तो बिगड़ती हुई बात भी बन सकती है।