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ईपीएफ ब्याज दर को घटाना तर्कसंगत नहीं

इन दिनों कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर ब्याज दर को लेकर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के 4.5 करोड़ कर्मचारी चिंतित हैं।

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Sunil Sharma

Dec 01, 2017

EPFO

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- डॉ. जयंतीलाल भंडारी, आर्थिक मामलों के जानकार

बचत योजनाओं पर कम ब्याज दरों ने छोटे निवेशकों का दूरगामी अर्थ प्रबंधन बिगाड़ दिया है। पीपीएफ व केवीपी समेत सभी 11 छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरें घटने से बचत करने वालों की आमदनी संबंधी मुश्किलें बढ़ गई हैं।

इन दिनों कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर ब्याज दर को लेकर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के 4.5 करोड़ कर्मचारी चिंतित हैं। खबर है कि ईपीएफओ भविष्य निधि जमा पर वर्ष 2017-18 के लिए ब्याज दर में कटौती कर सकता है। पिछले वर्ष 2016-17 में ईपीएफओ ने 8.65 फीसदी ब्याज दिया था। वर्ष 2017-18 में ईपीएफ पर ब्याज दर घटाने का कारण बांड पर निम्न आय तथा ईपीएफ निवेश सीधे अंशधारक सदस्यों के खातों में डालने की योजना है। श्रम संगठनों के साथ ईपीएफओ सदस्यों का सरकार से आग्रह है कि वर्ष 2017-18 में ईपीएफ पर ब्याज दर नहीं घटाई जाए।

यकीनन ईपीएफ पर 8.65 फीसदी ब्याज की मांग कई आधारों पर न्याय संगत है। वैश्वीकरण के इस दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कर्मचारियों की सुविधाएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं पर भारतीय संविधान में श्रमिकों और कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा, बीमारी और गरीबी से बचाने के प्रावधानों के बावजूद उन्हें ऐसे लाभ नहीं मिल रहे हैं। कोई व्यक्ति जिंदगी के अधिकतम कार्यशील वर्षों में अपनी सेवाएं किसी संगठन को देता है और इस दौरान अपनी कमाई का कुछ हिस्सा वह ईपीएफ में इसलिए जमा कराता है ताकि सेवानिवृत्ति बाद जिंदगी में सुरक्षा व निश्चिंतता प्राप्त कर सके । लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में भविष्य निधि सहित अन्य बचत योजनाओं पर कम ब्याज दरों के के कारण छोटे निवेशकों का दूरगामी आर्थिक प्रबंधन चरमराते हुए दिखाई दे रहा है।

उल्लेखनीय है कि पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) और किसान विकास पत्र समेत सभी 11 छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरें घटने से बचत करने वालों की आमदनी संबंधी मुश्किलें बढ़ गई हैं। यद्यपि सरकार की यह बात ठीक है कि अर्थव्यवस्था को सुस्त होने की बजाय इसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए देश को कम ब्याज दरों की दिशा में बढऩा जरूरी है। लेकिन, यह भी तय है कि ऐसे फैसलों से छोटी बचत के रूप में संगृहीत धनराशि भी घटेगी। छोटी बचतों के सहारे जिंदगी किसी की बिटिया की शादी, सामाजिक रीति-रिवाजों की पूर्ति, बच्चों की पढ़ाई और सेवानिवृत्ति बाद का सुरक्षित जीवन का स्वप्न भी बिखरेगा।

सामाजिक सुरक्षा पर तैयार विश्व आर्थिक मंच की 130 देशों की रिपोर्ट में भारत 103वें स्थान पर है। ख्यात संगठन आक्सफेम की वैश्विक सामाजिक सुरक्षा अध्ययन रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत 149वें स्थान पर है। यानी देश के आम आदमी से अब भी सामाजिक सुरक्षा बहुत दूर है। ऐसे में ईपीएएफ ब्याद दर में कमी तर्कसंगत नहीं लगती।