वर्क एंड लाईफ

राजस्थान की पारम्परिक चित्रकला

संस्कृति जीवन का प्रतिबिम्ब कही जाती है। कला के प्रति मानव-मन का आकर्षण स्वाभाविक है। विचार और कल्पना की हृदयस्पर्शी प्रस्तुति ही कला है।

3 min read
Jan 03, 2018
rajasthani handicraft art

- चन्द्रकान्ता शर्मा

संस्कृति वह है जो मनुष्य द्वारा निर्मित है। मनुष्य विचार और कर्म के क्षेत्र में जो सृजन करता है वह संस्कृति कहलाती है। संस्कृति किसी जाति या समाज के उत्कृष्ट बौद्धिक एवं मानसिक विकास को इंगित करती है। स्वभावतः मनुष्य जीवन को सुन्दर बनाने एवं सजाने-संवारने के लिए प्रयासरत रहता है। इस सौन्दर्य की अनुभूति को वह विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। साहित्य, संगीत एवं कला की अभिव्यक्ति भी मानव की सौन्दर्य जिज्ञासा को उद्घाटित करती है।

ये भी पढ़ें

चीन के नापाक इरादे!

इसीलिए संस्कृति जीवन का प्रतिबिम्ब कही जाती है। कला के प्रति मानव-मन का आकर्षण स्वाभाविक है। विचार और कल्पना की हृदयस्पर्शी प्रस्तुति ही कला है। वह मानव के मनोभावों एवं कार्य व्यापारों को मूर्तित करती है। चित्रकला के माध्यम से कल्पकार रेखाओं और रंगों के द्वारा सजीवता उत्पन्न करता है, निराकार कल्पना को साकार करता है।

राजस्थान अपने कलेवर में अपार सांस्कृतिक सम्पदा को संगहीत किए हुए हैं। यहाँ राज्याश्रयों एवं लोक जीवन में कला के अनेक रंग बिखरे हुए हैं। शिल्प एवं कला के क्षेत्र में इस प्रदेश की शान निराली है। यहाँ सदियों से संस्कृति का यह स्त्रोत प्रवाहित होता आ रहा है। पुरातात्विक खोजों से बहुत से प्राचीन कलात्मक नमूने सामने आए हैं, फिर भी अपार सम्भावनाएँ धरती के गर्भ में छुपी हुई हैं। पुरातत्व उत्खनन एवं अनुसंधान से अनेक ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हुए हैं।

जिनसे ज्ञात होता है कि राजस्थानी चित्रकला का सूत्रपात प्रागेतिहासिक काल से ही हो गया था। इस कला के चिन्ह मध्य प्रदेश एवं गुजरात आदि क्षेत्रों में भी पाए गए हैं। राजस्थान के चित्रों की प्राचीनता की प्रामाणिकता के लिए प्रागेतिहासिक काल के भितिचित्र राजस्थान के दक्षिण पूर्व में आलनिया, कन्यादह, काली का कुआँ, अमरेश्वर हाडौती की पर्वत श्रृंखलाओं में उपलब्ध हो चुके हैं।

कुछ वर्ष पूर्व तक यह भी माना जाता रहा था कि राजस्थानी चित्रकला का उद्गम जैन या गुजरात शैली से है, जिसका समय जैन हस्तलिखित ग्रंथ प्रज्ञापारमिता, कल्प सूत्र, काल का चार्म के आधार पर तेहरवीं शताब्दी निश्चित किया गया था, परन्तु अब राजस्थान में ऐसे ग्रंथ प्राप्त हो चुके हैं जिनका विषय जैन धर्म नहीं है तथा गुजरात की सीमाओं के बाहर जिनकी रचनाएँ की गई हैं जैसे बाल गोपाल स्तुति, काम सूत्र, गीत गोविन्द आदि। चूँकि गुजरात शैली एवं राजस्थान शैली के प्रारम्भिक चित्रों में बहुत साम्य पाया जाता है।

इसलिए कुछ विद्वानों को ऐसा मत देना पड़ा। राजस्थानी चित्रकला का स्वरूप गुप्त काल में और बिखरा हुआ प्रतीत होता है। मध्यकाल में मुगलों के सम्पर्क में आने से ईरानी काल का सम्मिश्रण भी हुआ। हुमायू के समय में अब्दुरसमद और मीर सैयद अली कलाकारों द्वारा ईरानी प्रभाव भारतीय कला के साथ-साथ राजस्थानी चित्रकला पर भी पड़ा। अकबर के शासन काल में राजस्थानी चित्रकला में मुगल चित्र शैली की झलक दिखाई पड़ना स्वाभाविक है।

भारत में जेसुईट मिशनरी के आगमन से यूरोपीयन कला का भी राजस्थानी कला में समावेश हुआ। जहाँगीर काल में चित्रों में फोटोग्राफी जैसी यथार्थता का उपक्रम किया जाने लगा। फलस्वरूप आकृति चित्रों की बहुलता हो गई। औरंगजेब के समय कला का ह्ास होने लगा। कलाकारों ने राजपूत राजाओं के यहाँ प्रश्रय पाया और वे कागंड़ा की पहाड़ी रियासतों तक पहुँच गए।

इन स्थानों पर पहुँच कर उन्होंने साहित्य का अनुगामी होकर कला का प्रसार किया। वैष्णव सम्प्रदाय के प्रसार, भक्ति आन्दोलन और साहित्यिक पुनरूत्थान के माध्यम से कला ने एक नवीन स्वरूप प्रस्तुत किया जो राजस्थान में भी व्याप्त हो गया।

राग-रागनियाँ, बारहमासे, नायिका भेदी, पंच तंत्र, गीत गोविन्द, रसिक प्रिया, बिहारी, सूर, परमानन्ददास की कृतियों पर चित्र सभी कला के आश्रयदाताओं ने बनवाए जो उदयपुर , जयपुर, बीकानेर , जोधपुर , कोटा , बूँदी, जैसलमेर , नागौर आदि चित्र शैलियों में रूपातंत्रित हुए।

राजस्थान में कुशवाहे, राठौड़, हाड़ा और सिंसोदिया आदि चार वंशों ने बड़े भू-भाग को अपने अधिकार में कर लिया और इन्हीं के चार प्रधान नगर राजस्थानी कला के चार पीठ बन गए। ये प्रान्त हाड़ौती, मेवाड़, मारवाड़ और ड़ूंढ़ाड़ के नाम से विख्यात हैं तथा जयपुर, जोधपुर, बूँदी, उदयपुर राजस्थानी कला के उद्गम केन्द्र थे। इन्हीं चार प्रधान केन्द्रों से अनेक सहायक शाखाएँ बनीं यथा बूँदी, कोटा, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, किशनगढ़, उदयपुर, मेवाड़, नाथद्वारा, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जयपुर, करौली, भरतपुर आदि।

इस प्रकार राजस्थानी शैली केवल राजस्थान में फलने-फूलने वाली परम्परा है जिसकी प्रत्येक दृष्टि से अपनी एक मर्यादा, एक विशेषता है। आधुनिक काल में योरोपीय कला के सम्पर्क से राजस्थानी चित्रकला में एक नया मोड़ आया। भित्ति चित्रों से हटकर पुस्तक लघु चित्रों का एक नवीन महत्त्व रहा। प्राचीन परम्परा से हटकर नवीन शस्त्रीय लघु चित्र बने जिसमें ईरानी और पाश्चात्य देशों का भी समन्वय था।

पाश्चात्य कला के पदार्पण से तेल व्यक्ति चित्र बनने लगे। चित्र कला एक शास्त्रीय अभ्यास बनने लगी। चित्रों में आधुनिक परिवेश की उपस्थिति बढ़ती गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् प्रयोगों का दौर शुरू हुआ। राजस्थान में ललित कला अकादमी की स्थापना हुई और उसके द्वारा आयोजित प्रदर्शिनियों के माध्यम से चित्रकला का प्रचार और प्रसार हुआ है।

जिसमें अनेक युवा कलाकार आधुनिक शैली के चित्रों की रचना में संलग्न है। आज राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में चित्रकला के विविध आयाम स्थापित हो चुके हैं यहाँ की चित्रकारी देश-विदेश में लोकप्रिय ख्याति अर्जित कर चुकी है। राजस्थान सरकार का संस्कृति एवं पर्यटन विभाग भी राजस्थानी चित्रकला के प्रचार प्रसार में सहयोग अर्पित कर रहा है।

ये भी पढ़ें

पाक पर ट्रंप का बयान: कितना दम?
Published on:
03 Jan 2018 02:17 pm
Also Read
View All