सामाजिक सोच में बदलाव आया
- डॉ. मोनिका शर्मा
हमारे सामाजिक पारिवारिक माहौल में शादी का रिश्ता नहीं चल पाता तो लड़कियां ही गिल्ट में डूबी रहती थीं। उनमें आत्मग्लानि का भाव भरने का काम पूरा परिवेश करता था। अब इस सोच में सुखद बदलाव आया है। घर के बड़े-बूढ़े भी कहने लगे हैं कि ना निभ सके तो पूरी ज़िन्दगी खराब नहीं कर सकते लड़की की। सचमुच, रिश्ता बोझ और पीड़ादायी ना बने,आपसी समझ हो। आत्मीयता हो, तो ही साथ रहने के मायने हैं। दिनों नया माहौल बना है। उन महिलाओं और लड़कियों के मन में गिल्ट भरा जा रहा है जिनका रिश्ता अच्छा चल रहा है। जो शादीशुदा ज़िन्दगी जी रही हैं। वैवाहिक जीवन के सारे खट्टे-मीठे रंग जीते हुए यह कहने की हिम्मत कर ले रही हैं कि 'भई.. हम भी खुश हैं'।
हाल ही में इस त्योहार के मौके पर देखा कि कुछ लोग हर तरह महिलाओं को यह समझाने की कोशिश में जुटे हैं कि तुम कितनी दबी कुचली हो। डाइटिंग कर अपनी सेहत बिगाड़ लेने वाली नई सोच उन्हें यह समझा रही है कि इतने घंटे भूखे रहने से स्वास्थ्य से जुड़ी कितनी तकलीफें हो सकती हैं। दुनियाभर की तानेबाज़ी यह कहकर की गई कि पति के पैसे से गहने खरीद लिए तो तुम और तुम्हारा अस्तित्व ही मिट गया। हाँ, ये बात और है कि यही महिलायें और पुरुष महिलाओं को उनके काम की कितनी कीमत यह भी समझाते हैं।
अपने विचार रखने और खुलकर मन की कहने की आज़ादी के समर्थक ऐसे लोग, जो महिलायें मन से लाल रंग के कपड़े पहन ले रही हैं उसे सबसे ज्यादा बेरंग और दबा कुचला रंग बता रहे हैं। लेकिन सभी को अपने मन मुताबिक जीने का हक़ है तो इन दबी कुचली पुरातनपंथी औरतों को भी मन का कर लेने दीजिये ना। घर-परिवार में सब कुछ फ़िल्मी सा नहीं होता यह सच है। रिश्तों के उतार-चढ़ाव भी होते हैं। पर ऐसे तो पति-पत्नी ही क्यों ? आजकल तो भाई-बहन भी जायदाद के लिए लड़ रहे हैं। माँ-बाप और बच्चों में भी नहीं जम रही। दोस्त भी धोखेबाज़ निकलते हैं।
हर त्योहार बाज़ार की भेंट चढ़ गया है। तो फिर सब कुछ ही छोड़ दिया जाय। अगर नहीं तो फिर किसी एक दिन त्योहार के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसे कोसने का क्या फ़ायदा? उसमें भी जो मना रही हैं उनमें गिल्ट भरने की इतनी कोशिश ? बीते कई सालों से देख रही हूँ कि यूँ व्रत त्योहार मनाने वाली औरतों के मन में ग्लानि भरने की सोच असर भी करने लगी थी। मानो अपने घर परिवार से जुड़कर वे कोई अनर्थ कर रही हों। पर इस बार वे सच में बड़ी सहिष्णु हो गईं जी भरकर ऐसे पोस्ट साझा कर रही हैं जिनमें उत्सवीय रंग दिख रह रहे हैं। ऐसे कुतर्क वाली वाली पोस्ट पर या तो सटीक जवाब दे रही हैं या इन्ग्नोर कर निकल ली हैं कि अपनी ख़ुशियों पर ध्यान दो री .....
फेस बुक वाल से साभार