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काफी आलोचना के बाद आखिर चुनाव आयोग ने गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर ही दिया। साथ ही राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई। केंद्र या राज्य सरकार अब वहां के लिए न तो लोक-लुभावन घोषणाएं कर पाएगी और न ही शिलान्यास अथवा लोकार्पण हो पाएंगे। चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही पाटीदार, ओबीसी और दलित जातियों की राजनीति करने वाले नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए रणनीति बनने लगी है।
पिछले २२ साल से गुजरात में भाजपा सरकार है। १२ साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी भले अब देश के प्रधानमंत्री बन चुके हों लेकिन भाजपा की तरफ से चुनावी चेहरा वही हैं। इस बार कांग्रेस की तरफ से कमान सोनिया गांधी की जगह राहुल गांधी ने संभाल रखी है। इन दोनों दलों के अलावा किसी तीसरे दल के लिए राज्य में कोई संभावना नहीं है। हां, हार्दिक पटेल , अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश के रूप में नए युवा क्षत्रप उभरे हैं। मुद्दा विकास, वंशवाद और भाजपा के २२ साल के कामकाज के इर्दगिर्द ही रहेगा। जनता दल (यू), आप और एनसीपी भी चुनावी समर को और धारदार बनाने में जुटे हैं। कांग्रेस से निकले शंकर सिंह वाघेला जन विकल्प मोर्चा के नाम से प्रत्याशी मैदान में उतारने की तैयारी में जुटे हैं।
गुजरात के चुनाव कई मामलों में अलग माने जा सकते हैं। डेढ़ दशक पहले हुए गोधरा काण्ड के बाद से राज्य की राजनीति अलग रंग ले चुकी है। विचारधारा के विरोध की लड़ाई अब वहां नफरत की राजनीति के रंग में रंग चुकी है। चुनावी सभाओं में हर पार्टी के नेता तल्ख बोल से चुनावी पारे को गर्माहट से भर देते हैं। इस तरह की राजनीति गुजरात में ही नहीं देश के लिए भी ठीक नहीं । गांधी और पटेल की धरती पर बड़े-बड़े नेताओं के लिए जुमलेबाज, पप्पू, फेंकू और मौत के सौदागर जैसे शब्दों का उपयोग खुलेआम किया जाता है।
ऐसा लगता है कि गुजरात में कोई चुनाव नहीं बल्कि महायुद्ध लड़ा जा रहा हो। विरोधी दल एक-दूसरे के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते नजर आते हैं। दु:ख की बात है कि चुनावी तल्खी कम होने की जगह हर साल नया रूप लेती जा रही है। सत्ता हथियाने के संघर्ष में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघने से बचा जाए। राजनीतिक दलों के साथ-साथ देश के भविष्य के लिए भी यही अच्छा होगा।

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