
rajasthan high court jaipur
नीति में धर्म नहीं होता। साम, दाम, दण्ड, भेद ही नीति के हथियार होते हैं। नीति में चतुराई से अधिक चालाकी काम आती है। एक शिक्षा मंत्री के पास किसी स्कूल में बच्चों को भर्ती कराने के लिए बहुत लोग आने लगे। स्कूल में जगह थी ही नहीं। फिर भी प्रत्येक बच्चे के लिए सिफारिशी पत्र पर हस्ताक्षर करते गए। प्रिन्सिपल को इशारा भी कर दिया। उसने पत्रों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। भर्ती किसी को नहीं किया। आखिर तो अभिभावकों के सब्र का बांध टूटना था। एक दिन कुछ अभिभावक प्रिन्सिपल से लड़ पड़े। प्रिन्सिपल ने सबको बिठाया और दराज में से एक कागजों का पुलिन्दा निकालकर सबसे सामने रख दिया। बोले- ‘आप लोग देख लीजिए। इन सभी पत्रों में मंत्री जी ने सिफारिश करने को हस्ताक्षर कर रखे हैं। इनके लिए मुझे तो नया क्लास रूम बनवाना पड़ेगा। कैसे मैं सब बच्चों को भर्ती कर सकता हूं?’ तो यह है चालाकी-लोगों की आंखों में धूल झोंकना। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
राजस्थान सरकार इसी पटरी पर चल रही है। गुर्जर आरक्षण का मुद्दा हो, पट्टा वितरण और नियमित करने (अवैध बसावट को) की बात हो, मास्टर प्लान से छेड़छाड़ का दु:साहस हो चाहे भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला संशोधन। यहां तक कि बुधवार को राज्य विधानसभा से पास ‘विधायकों के लिए लाभ का पद बचाने’ का लालीपॉप या फिर गुरुवार को पास एसबीसी विधेयक। सबके सब मुद्दे जो चुनाव के नाम पर जोर आजमाइश कर रहे हैं और जिनका स्वीकार किया जाना सरकार के लिए संवैधानिक रूप से संभव नहीं है, उन सभी मुद्दों पर सरकार प्रभावितों के पक्ष में फैसले करती रहती है। इस प्रकार सभी वर्गों का विश्वास जीतने का प्रयास कर रही है। क्या सरकार फैसला करते समय नहीं जानती कि ये फैसले न्यायालय में टिक नहीं पाएंगे? जानती है। फिर भी फैसला करती जाती है।
गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को कितनी बार कोर्ट में हारना पड़ा। पिछले दस वर्षों में कम से कम पांच बार ऐसा हुआ है। राज्य सरकार ने उन्हें आरक्षण के विधेयक बनाए, अधिसूचना जारी की और उच्च न्यायालय ने उन्हें रद्द कर दिया। किन्तु गुरुवार को फिर उसने आरक्षण का ओबीसी कोटा २१ प्रतिशत से बढ़ाकर २६ प्रतिशत करने का विधेयक विधानसभा से पारित करवा लिया। इससे राज्य में आरक्षण ५० प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्पष्ट उल्लंघन होगा। जैसा अब तक होता रहा है, यह न्यायालय से फिर लौट जाएगा। सरकार गुर्जरों की सीधी नाराजगी से बच जाएगी। ठीकरा कोर्ट के माथे फूटेगा। कोर्ट भी सारे विधायकों के विरुद्ध अवमानना तो जारी नहीं करेगा।
मास्टर प्लान के मामले में जनवरी २०१७ का राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला स्पष्ट है। सरकार ने चुनाव की दृष्टि से जो लोक लुभावन वादे लोगों से किए थे, उनको पूरे नहीं कर पा रही है। फिर भी बीच-बीच में आदेश निकालकर कुछ अवैध कब्जों को नियमित करने की बात भी करती जाती है, कुछ को हटाती भी जाती है। हर बार तारीख पर पुराने आदेश की अर्थी उठ जाती है। अगली तारीख से पहले फिर नया गैरकानूनी आदेश जारी कर देती है। जानती भी है कि यह आदेश भी रद्द ही होगा। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। वहां भी राहत नहीं मिली। किन्तु लोगों को सीधे नाराज करने से अच्छा है कोर्ट का आदेश सामने रख दे।
भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण का अध्यादेश भी इसी नीयत से जारी किया। अफसर प्रसन्न हो गए। सरकार जानती थी परिणाम क्या होंगे? देशभर में सरकार कलंकित हो गई। कोर्ट में भी मुद्दा टिकने वाला नहीं था। सरकार ने विधानसभा की प्रवर समिति को मामला सौंपकर कोर्ट में इज्जत बिगडऩे से रोक ली। अब अफसर भी सरकार को दोष कैसे दे सकेंगे? उनका काम भी नहीं हुआ। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।
सरकार का दु:साहस कही रुकने को तैयार ही नहीं। विधानसभा में ‘लाभ का पद’ बचाकर विधायकों को एक बार तो खुश कर दिया। क्या अफसरों के संरक्षण बिल के साथ इस मुद्दे पर भी विधि विभाग ने चेतावनी नहीं दी थी? क्या आगे यह मुद्दा भी कोर्ट में टिक पाएगा? क्या सरकार यह नहीं जानती कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यहां तक कह चुका है कि, कोई भी विधानसभा इस पर कानून नहीं बना सकती। कोई भी सरकार १५ प्रतिशत से ज्यादा विधायकों को लाभ का पद नहीं दे सकती।
अब भी सरकार जानती है कि कोर्ट में यह कहीं नहीं टिकने वाला परन्तु सामने वालों को राजी रखने के लिए ठीकरा कोर्ट के सिर फोडऩे के लिए कानून बना दिया। यही तो चालाकी है। अफसर भी नहीं समझ पाए। लोगों की आंखों में जमकर धूल झोंकी जा रही है। नित नए आदेश संविधान अथवा कानून के अथवा न्यायालय के फैसलों के विरुद्ध जारी हो जाते हैं, यह मानकर कि ये कोर्ट में खारिज हो जाएंगे। और कोर्ट के हर फैसले को सहर्ष मान भी लेते हैं। सरकार ने लोगों के काम न करने का अच्छा कानूनी रास्ता निकाल लिया है। इससे अधिक चालाक तो बिल्ली मौसी भी नहीं होती।
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