
डॉ. डी.पी. शर्मा, यूनाइटेड नेशंस से जुड़े डिजिटल डिप्लोमेट- यूंतो 21वीं सदी की भू-राजनीति में रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र रही है। हाल में भारत और रूस के बीच 'रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट' (रेलोस) का प्रभावी होना इस सिद्धांत की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। फरवरी 2025 में हस्ताक्षरित और जनवरी 2026 में क्रियान्वित यह समझौता केवल एक तकनीकी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह दो पुराने सामरिक मित्रों के बीच सैन्य भरोसे की नई गहराई को मापता है। समझौते के अनुसार, दोनों देश विशेष परिस्थितियों, संयुक्त युद्धाभ्यास या मानवीय सहायता के दौरान एक-दूसरे की सीमा में अधिकतम 3000 सैनिक तैनात कर सकते हैं और इसे आवश्यकतानुसार घटाया-बढ़ाया भी जा सकता है। एक समय में अधिकतम पांच युद्धपोत एक-दूसरे के बंदरगाहों का उपयोग कर सकेंगे। समझौते के तहत दस सैन्य विमानों को एक-दूसरे के एयरबेस व हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति दी गई है। यह समझौता प्रारंभिक रूप से पांच वर्षों के लिए प्रभावी है, जिसे आपसी सहमति से अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाया भी जा सकता है।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 68.7 बिलियन अमरीकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तो को और अधिक मजबूती प्रदान करता है और वह भी उस वक्त जब भारत पाकिस्तान बांग्लादेश चीन जैसे देशों के साथ मल्टी फ्रंट सीमा तनावों के बीच से गुजर रहा है। हालांकि इसमें व्यापार असंतुलन (आयात 63.84 बिलियन बनाम निर्यात 4.88 बिलियन डॉलर) एक बड़ी चुनौती भी है, जो वर्तमान चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक निर्भरता को रणनीतिक मजबूती में बदल देती हैं। इस संधि के बाद भारत रूसी आर्कटिक बंदरगाहों का उपयोग ईंधन भरने और मरम्मत के लिए कर सकेगा। रूस के 'आइसब्रेकर' जहाजों की मदद से भारत उत्तरी समुद्री मार्ग तक अपनी सामरिक पहुंच भी बना सकता है, जो भविष्य के वैश्विक व्यापार का मुख्य केंद्र बनने वाला है। इसके अतिरिक्त जहां एक ओर भारत ने अमरीका के साथ लेमोआ समझौता किया है, वहीं रूस के साथ रेलोस कर भारत ने संतुलित शक्ति प्रदर्शन किया है ठीक उसी प्रकार जैसे अमरीका पाकिस्तान और भारत के साथ करता है। यह स्पष्ट करता है कि भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है। रूस-चीन धुरी पर अंकुश यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय रही है। भारत ने इस समझौते के जरिए रूस को यह संदेश दिया है कि रक्षा और रणनीतिक मामलों में भारत अब भी रूस का अपरिहार्य साझेदार है, जिससे रूस को चीन के प्रभाव से संतुलित रहने में मदद मिलेगी। वैश्विक मंच और एशिया महाद्वीप में रूस भी चाहेगा कि उसकी शक्तिशाली पोजिशन चीन की तुलना में हमेशा अमरीका के बाद नंबर दो पर ही रहे न कि चीन के बाद तीसरे नंबर पर। सनद रहे कि भारत और रूस का आपस में कोई सीमा विवाद और कॉम्पिटिशन नहीं है, जबकि चीन-रूस का आपस में सीमा विवाद भी रहा है और कॉम्पिटिशन भी। भारत इसका फायदा उठा सकता है।
ऐसा भी नहीं है कि यह समस्त सामरिक एवं व्यापारिक संतुलन बनाए रखना भारत के लिए इतना आसान है। रेलोस समझौता एक ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यवस्था दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। एक तरफ अमरीका और यूरोप हैं और दूसरी तरफ रूस-चीन का नवीन गठबंधन। भारत इस द्वंद्व के बीच अपने फायदे का 'स्वर्ण सेतु' बनाने की भूमिका निभा रहा है। भारत रूस का यह समझौता भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' की नीति की एक बड़ी सफलता माना जा सकता है। यह समझौता सुनिश्चित करेगा कि संकट के समय भारत के पास विकल्पों की कमी न हो। जहां अनेक उतार-चढ़ावों के बीच अमरीका के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ रहा है, वहीं रूस के साथ 'लॉजिस्टिक्स' सहयोग भारत को एक वैश्विक सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा। हालांकि, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि रूस पर सैन्य निर्भरता अर्थात जो अब भी भारत के रक्षा उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा है, धीरे-धीरे 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के माध्यम से कम हो, ताकि सहयोग का आधार बराबरी का हो, न कि केवल निर्भरता का। अंतत: रेलोस समझौता मात्र एक पैक्ट नहीं है बल्कि बदलते विश्व में भारत की 'रणनीतिक मजबूती' का एक नया घोषणापत्र है।
Updated on:
22 Apr 2026 03:51 pm
Published on:
22 Apr 2026 03:50 pm
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