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धरा बचाने की मजबूत कड़ी भारतीय नारी

देशभर में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) इस परिवर्तन के अग्रदूत बने हैं। सेल्फ एम्प्लॉयड वीमंस एसोसिएशन, जिसका मुख्य केंद्र अहमदाबाद (गुजरात) है, से जुड़ी महिलाओं ने हस्तशिल्प, कपड़ा और टिकाऊ उत्पादों के माध्यम से न केवल प्लास्टिक के विकल्प विकसित किए हैं, बल्कि लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाया है।

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विजया रहाटकर अध्यक्ष, राष्ट्रीयमहिला आयोग - भारत के किसी भी सामान्य घर में सुबह का एक दृश्य देखिए- एक महिला रसोई में काम करते हुए गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग रखती है, बची हुई सब्जियों से खाद बनाती है और प्लास्टिक को अलग थैले में जमा करती है। वह शायद यह नहीं जानती कि वह 'सस्टेनेबिलिटी' का कोई बड़ा सिद्धांत लागू कर रही है, लेकिन सच यह है कि वह चुपचाप देश के पर्यावरण संरक्षण का आधा काम अकेले ही कर रही है। आज जब हम पृथ्वी दिवस की बात करते हैं, तो यह समझना आवश्यक है कि भारत में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका केवल सहभागिता नहीं, बल्कि नेतृत्व की रही है।

देशभर में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) इस परिवर्तन के अग्रदूत बने हैं। सेल्फ एम्प्लॉयड वीमंस एसोसिएशन, जिसका मुख्य केंद्र अहमदाबाद (गुजरात) है, से जुड़ी महिलाओं ने हस्तशिल्प, कपड़ा और टिकाऊ उत्पादों के माध्यम से न केवल प्लास्टिक के विकल्प विकसित किए हैं, बल्कि लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाया है। इसी प्रकार, केरल के कोवलम में महिला समूहों ने कचरे से उपयोगी वस्तुएं बनाकर यह दिखाया है कि अपशिष्ट भी संसाधन बन सकता है। वहीं स्वच्छ(एसडब्ल्यूएसीएच), पुणे (महाराष्ट्र) का सशक्त मॉडल है, जहां हजारों महिलाएं प्रतिदिन शहर के कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन कर पुनर्चक्रित करती हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ उन्हें सम्मानजनक आजीविका भी प्राप्त होती है। पूर्वोत्तर भारत में भी महिलाएं सतत विकास की अग्रिम पंक्ति में हैं। माजुली द्वीप (असम) जैसे क्षेत्रों में महिलाएं इको-टूरिज्म को बढ़ावा दे रही हैं। मेघालय के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की ओर से संचालित होम-स्टे और सामुदायिक पर्यटन मॉडल यह सिद्ध करते हैं कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं। ग्रामीण भारत में यह परंपरा और भी गहरी है। गांवों में महिलाएं वर्षों से जैविक कचरे से खाद बनाती आई हैं, जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को अपनाती रही हैं और संसाधनों का अत्यंत विवेकपूर्ण उपयोग करती हैं। वडोदरा (गुजरात) में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की ओर से गीले कचरे को खाद में बदलने की पहल यह दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।

ये प्रथाएं किसी नीति के तहत नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में विकसित हुई हैं। आज आवश्यकता है कि हम इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पहचानें और उन्हें नीति निर्माण में स्थान दें। भारतीय घरों में पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण की आदतें भी उल्लेखनीय हैं। एक साधारण टूथब्रश, जो अपनी मूल उपयोगिता खो देता है, वह भी सफाई के काम में फिर से उपयोग हो जाता है। पुराने डिब्बे, बोतलें और कपड़ों का कोई न कोई नया उपयोग खोज लिया जाता है। यह सोच हमें सिखाती है कि 'फेंकनाÓ अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। यह भी जरूरी है कि हम टिकाऊ विकल्पों की ओर बढ़ें जैसे बांस के टूथब्रश, स्टील या कांच के कंटेनर और सिंगल-यूज प्लास्टिक का पूर्ण त्याग। केवल पुन: उपयोग ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें उपभोग के पैटर्न को भी बदलना होगा।

पृथ्वी दिवस हमें केवल एक दिन के उत्सव का अवसर नहीं देता, बल्कि यह एक जिम्मेदारी की याद दिलाता है। हमारी धरती- हमारी 'मां' सिर्फ संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। अब समय आ गया है कि हम महिलाओं के इस मौन योगदान को पहचानें, उसे सशक्त करें और हर नागरिक को उत्तरदायी बनाएं। पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है और इस दिशा में हर कदम, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो, भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक मजबूत संकल्प है।