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संपादकीय: सत्ता के मद में कानून की अनदेखी से उठते सवाल

भाजपा विधायक प्रीतम लोधी के पुत्र दिनेश लोधी पर आरोप है कि उसने अपनी लग्जरी कार से कुछ लोगों को कुचलने की कोशिश की।
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जयपुर

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Pankaj Shrivastav

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Updated: 22 Apr 2026, 3:37 PM IST

राजनीति को सेवा का माध्यम कहा जाता रहा है, लेकिन आए दिन जनप्रतिनिधियों और उनके परिजनों के आचरण से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि सत्ता की चमक-दमक के आगे जनता उनके लिए कुछ भी नहीं है। मध्य प्रदेश के पिछोर से आई एक घटना ऐसे ही कड़वे सच से जुड़ी है। भाजपा विधायक प्रीतम लोधी के पुत्र दिनेश लोधी पर आरोप है कि उसने अपनी लग्जरी कार से कुछ लोगों को कुचलने की कोशिश की। वह भी सिर्फ इसलिए कि उसे सड़क पर रास्ता नहीं दिया गया। हैरत इस बात की है कि अपने पुत्र के इस कृत्य पर संयम और जिम्मेदारी दिखाने के बजाय 'माननीय' ने कार्रवाई करने वाले आइपीएस अधिकारी को ही धमका डाला।

राजनीति 'विशेषाधिकार' का पासपोर्ट बनती जा रही है। यह कई नेताओं और उनके परिजनों के आचरण में साफ दिखता है। साथ ही यह भी कि कानून जैसे उनके लिए नहीं, बल्कि उनके अधीन है। सड़क पर आम नागरिक की तरह चलने का धैर्य भी अगर 'शहजादों' में नहीं बचा, तो यह न केवल व्यक्तिगत विफलता है, बल्कि इसे राजनीतिक संस्कारों को ताक में रखने वाला कृत्य भी कहा जाएगा। यह सवाल सिर्फ एक विधायक या उनके पुत्र तक ही सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं- कहीं पुलिस को फोन पर धमकाया जाता है, कहीं सरकारी अमले को 'पहुंच' का अहसास कराया जाता है। विडंबना यह भी है कि इस तरह के घटनाक्रम में वर्दी की भूमिका भी कठघरे में आती है। कुछ अफसर तो सत्ता के आगे इतने नतमस्तक हो जाते हैं कि वे अपने दायित्वों को भूल बैठते हैं। जी-हुजूरी और चापलूसी का यह चलन न केवल प्रशासनिक तंत्र को कमजोर करता है, बल्कि उन ईमानदार अधिकारियों का मनोबल भी तोड़ता है, जो नियमों के तहत काम करना चाहते हैं। यही कारण है कि जब कोई अधिकारी नियमों के अनुसार कार्रवाई करता है, तो वह 'अपवाद' बन जाता है और उसी पर दबाव बनाने की कोशिश होती है। सवाल यह है कि क्या जनता के प्रतिनिधियों के परिवार कानून से ऊपर हैं? अगर जवाब 'नहीं' है, तो फिर कार्रवाई का अभाव इस 'नहीं' को 'हां' में बदलने का काम कर रहा है। यहां राजनीतिक दलों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। 'शुचिता' और 'नैतिकता की राजनीति' के दावे तभी सार्थक होंगे, जब ऐसे मामलों में त्वरित और सख्त कार्रवाई की मिसाल पेश की जाए। आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। साथ ही, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि वे बिना किसी दबाव के कानून के अनुसार काम कर सकते हैं। पुलिस अधिकारियों की सुरक्षा और स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत तंत्र मजबूत करना होगा ताकि वे राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर निर्णय ले सकें।