
- श्रुति अग्रवाल
मंदसौर की गुड़िया...गैंग रेप की शिकार। 7 साल की मासूम बच्ची... उसके मासूम जिस्म ही नहीं रूह को भी दांतों से कांटा गया, नाखूनों से नोचा गया था। ज्यादती के 35-38 दिन बाद कोर्ट रूम में खड़ी होती है। जज के सामने निडरता से बोलती है, ये अंकल पहले आए और ये अंकल बाद में आए थे। फिर से कोर्ट रूम का दृश्य अपने जेहन में दोहरा कर देखिए। अपने मासूम को कटघरे में खड़ा हुआ बस महसूस करके देखिए। लगेगा काश कोई कानों में सीसा डाल दें। आप सुनना नहीं चाहेंगे। भाग जाना चाहेंगे...डूब मरना चाहेंगे। फिर अब क्यों नहीं...बचपन से सुनते आ रहे हैं, बच्चे सबके सांझा होते हैं। अब...
बहुत दिन हो गए...मुज्जफरपुर कांड सुन दिल-दिमाग ही नहीं आत्मा को भी सांप सूंघ गया था। की-पेड पर अंगुलियों ने चलने से मना कर दिया था। सावन के अंधे की तरह हरियाली देखने की कोशिश विफल रही। मंदसौर की गुड़िया के बयान की खबर ने मुज्जफरपुर की बच्चियों के साथ बालसंरक्षण गृह में हुए हौलकनाक हादसे की याद दिला रहे हैं। दिमाग में हथौड़े बज रहे हैं। यौन आतंक के इस मामले में 34 बच्चियां...उफ्फ 6 गर्भवती...3 का अबॉर्शन...फिर 10 साल की एक पीड़िता ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने बोलती है, सूरज ढलते ही बालिकागृह की लड़कियों के बीच दहशत फैल जाती थी। पूरी रात यौन आतंक तांडव करता था। एक बच्ची बोलती है, हम मना करें तो हंटर वाले अंकल खूब मारते थे। उन्हें ड्रग्स के इंजेक्शन और नशीली गोलियां दी जाती थी, जिससे उनका अपने ही शरीर पर काबू ना रहे, मानिए बच्चियां ना हुई सैक्स टॉय हुईं। जिंदा गोश्त, हैवानियत के सामने परोसा हुआ।
दर्ज बयानों में एक पीड़ित बच्ची बालिका गृह के संचालक की पहचान रेपिस्ट और हंटर वाले अंकल के रूप में करती है। दूसरी बच्ची गुस्से से उसकी तस्वीर पर थूक देती है। वहीं ब्रजेश ठाकुर की तस्वीर मीडिया में आती है हंसती-मुस्कुराती। हंटर वाले अंकल की मुस्कुराहट में कितनी हैवानियत है वहीं सोचिए कितने दर्द-पीड़ा-अपमान से गुजर रही होगी वह बच्ची...10 साल की यौनअपराध पीड़िता को आप क्या कहेंगे...बच्ची ही तो है। वैसी ही बच्ची जो हमारे आस-पास इतराती-मटकती-मचकती-फुदकती घूमती हैं। जिनसे घर-बाहर की रौनक रहती है लेकिन ये बच्चियां....मुझे हर बच्ची की हंसी की खनक में भयावह चीत्कार सुनाई दे रही है। कान के पर्दे फोड़ लेना का जी कर रहा है।
हर महीने दर्जनों जज बालिका गृह का औचक निरीक्षण करने आते थे। किसी को कोई गड़बड़ ना दिखी फिर अचानक सब गड़बड़ कैसे हो गया? सही है अचानक सब गड़बड़ कैसे हो गया। इस संरक्षणगृह में हर माह जाने वाली दो महिला चिकित्सकों को कुछ गलत क्यों ना लगा? किसी सफेदपोश व्यक्ति, नेता, बड़े अधिकारी, जज आदि ने सीसीटीवी कैमरे के नहीं होने का मुद्दा क्यों नहीं उठाया? क्या बच्चियों के चेहरे पर लिखी हैवानियत की इबारत कोई महिला पढ़ नहीं पाई? क्या किसी के कानों तक इनका करुण रुदन पहुंचा ही नहीं? एक आया रात को कीड़े की दवाईं कह नशीली गोलियां देती थी। उफ्फ...ये सभी महिलाएं चरितार्थ कर रही हैं एक घटिया कहावत 'महिला ही महिला की दुश्मन होती है'।
ये बातें सुन खुद सीसा ले अपने कानों में डालने का मन कर रहा है। मैं ये घटिया बातें सुनना नहीं चाहती। टिस के स्टूडेंट्स मार्च में अपनी रिपोर्ट जमा करते हैं... जुलाई में जाकर कुछ कार्यवाही की शुरूआत होती है... संस्था को सरकार की तरफ से 40 लाख का चंदा मिलता है। अब काम जवाबदेहों के जवाब सुनना चाहते हैं... क्यों-क्यों टिस की रिपोर्ट पर इतनी देर से जांच शुरू हुई? क्यों बच्चियों को इतने दिन और हैवानियत के मंजर से गुजरना पड़ा ? क्यों सारा तंत्र इतना बेबस-लाचार-पंगु नजर आ रहा है... बच्चियों के वर्तमान को इतने घाव देने वाले दरिंदों का भविष्य तिल-तिल कर मरने वाला होना चाहिए। ये एड़िया रगड़े लेकिन मौत ना आए... तब जाकर शायद इन 34 बच्चियों में से कोई एक बच्ची चैन की नींद सो पाए। हमने अपने देश के भविष्य की रातों में सुहाने भविष्य के सपनों की जगह भयावह वर्तमान लिख दिया है... जब ये बच्चियां हैवानियत की दास्तां सुनाती हैं लगता है सीसा लूं, खुद अपने कानों में डाल लूं...
फेसबुक वाल से साभार