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- अरुणा रॉय, सामाजिक कार्यकर्ता
हफ्ते भर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर के बाहर धरना व विरोध प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाया तब काफी जश्न मना। अदालत ने कहा कि नागरिकों के सभा करने और विरोध करने के अधिकार पर पूरी तरह बंदिश नहीं लगाई जा सकती है। बोट क्लब पर भी धरना-प्रदर्शन को मंजूरी दे दी गई, जो नब्बे के दशक से ही प्रतिबंधित चला आ रहा था। बोट क्लब और उसके बाद जंतर-मंतर असंख्य धरनों व प्रदर्शनों के गवाह रहे हैं। समय के साथ ये जगहें असहमति और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के केंद्र के रूप में स्थापित होती गईं। यहीं से हमारे यहां कई अहम कानूनों, नीतियों, सार्वजनिक और नागरिक कार्रवाइयों ने शक्ल ली।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की रोक और नई दिल्ली के अधिकांश हिस्से में धारा 144 लगाए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘विरोध का अधिकार संविधान के अंतर्गत मूलभूत अधिकार माना जाता है। यह अधिकार एक ऐसे लोकतंत्र में अहम है जो प्रशासन में सूचित नागरिकता की भागीदारी पर टिका होता है। यह अधिकार इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सार्वजनिक मामलों में प्रत्यक्ष भागीदारी को समर्थ बनाकर प्रातिनिधिक लोकतंत्र को सशक्त करता है, जहां व्यक्ति और समूह अपनी असहमति और शिकायत दर्ज करा सकते हैं, प्रशासनिक खामियों को उजागर कर सकते हैं तथा राज्य के अधिकरणों सहित ताकतवर इकाइयों से जवाबदेही की मांग कर सकते हैं। भारत जैसे एक गतिमान लोकतंत्र में यह अधिकार निर्णायक है, लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा यह हाशिये पर रहने वाले लोगों और कमजोर प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मदद देने हेतु विशिष्ट भारतीय संदर्भ में अहम हो उठता है।’
संविधान के अनुच्छेद 19(1) के ‘अ’ और ‘ब’ उपबंध में वर्णित विरोध के मूलभूत अधिकार के संदर्भ में यह एक अहम रियायत है। इसीलिए यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण है, जो मूलभूत अधिकारों के उस अध्याय को दोबारा पुष्ट करता है जिसने हमेशा नागरिकों के लोकतांत्रिक हितों के उल्लंघन को रोका है।
अभिव्यक्ति की आजादी पर सिलसिलेवार बंदिशें लगाई गई हैं और इनका उल्लंघन किया गया है। अहम मूलभूत अधिकारों के सुनियोजित क्षरण को प्रोत्साहन देने में सत्ता प्रतिष्ठान का दुस्साहस प्रतिबिंबित होता है। उसका विशिष्ट उद्देश्य जनता और संविधान की आवाज को कमजोर करना है। इसीलिए हर क्षेत्र के लोग - लेखक, रंगकर्मी, दार्शनिक, राजनीतिक चिंतक, छात्र, अकादमिक संस्थाएं, राजनीतिक विरोधी और तमाम ऐसे लोग जो जनता से सीधे जुड़े हुए हैं, उन्हें समाजविरोधी तत्वों से धमकी मिलती रही है और सरकार मूक दर्शक बनी रही है। तमाम किस्म के लोकतंत्र विरोधी प्रतिबंधों की शृंखला में सार्वजनिक स्थलों पर हमला लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील की तरह था। धीरे-धीरे विरोध की जगहें संकुचित होती गईं और इस सरकार ने इन बंदिशों को समर्थन देने का ही काम किया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ऊपर हर किस्म की स्वतंत्रता टिकी हुई है। एक लोकतंत्र के भीतर जनता बोलने, प्रदर्शन करने, विरोध करने, असहमत होने की आजादी के बगैर असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक प्रशासन, कानून के उल्लंघन, सामाजिक हिंसा, भेदभाव और हिंसा की आलोचना आखिर कैसे कर सकेगी? बोट क्लब और जंतर-मंतर को धरने-प्रदर्शन के लिए खोलकर सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान में शांतिपूर्ण विरोध के मूलभूत अधिकार को अभिपुष्ट किया है। मौजूदा माहौल में यह अभिपुष्टि और ज्यादा अहम हो जाती है जब आलोचनात्मक स्वरों को चुप कराया जा रहा है। अदालत के शब्दों में, ‘वैध असहमति किसी भी लोकतंत्र का विशिष्ट कारक होती है।’
इतना कहने के बावजूद यह फैसला धारा 144 की बंदिशों के संबंध में प्रभावी समाधान नहीं दे पाता। अदालत ने पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के संबंध में दिशा-निर्देश निर्मित करने का निर्देश दिया है जबकि यही पुलिस प्रशासन अत्यधिक प्रतिबंधों को लागू करने का जिम्मेदार रहा है। अब भी मध्य दिल्ली में धारा 144 के अवैध तरीके से लगातार लगे होने का सवाल बना हुआ है। फैसले से साफ है कि हमें जो रियायत मिली है वह नियमित और सीमित है। पुलिस ऐसे नियम और निर्देश बनाएगी जो तय करेंगे कि कोई विरोध प्रदर्शन पर्याप्त ‘अहानिकर’ है या नहीं।
जिस देश में स्वतंत्रता का मूल वादा अब भी सपना हो और जहां भ्रष्टाचार व ताकत का मनमाना प्रयोग राजकाज का मखौल उड़ाता हो, वहां संवैधानिक गारंटी बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। अगर केंद्र सरकार धीरे-धीरे इन अधिकारों का हनन करती रही तो वह इस प्रक्रिया में राज्य का मूल चरित्र ही बदल सकती है। राज्य को लोकतांत्रिक गणराज्य के संवैधानिक ढांचे के भीतर ही काम करना होगा। संविधान और न्याय के खाके को कमजोर करने से राज्य की अवधारणा में बदलाव आएगा जो कि खतरनाक है। सार्वजनिक विरोध एक पावन चीज है, खासकर ऐसे देश में जो हर किस्म के भेदभाव का शिकार है। सार्वजनिक विरोध न केवल एक औजार है बल्कि गणराज्य की सेहत का माप भी है।
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