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बचपन का दौर जीवन का ऐसा पड़ाव है जहां शरीर के साथ-साथ आदतें भी आकार लेने लगती हैं। बच्चे जैसा खाते हैं वैसा ही उनका स्वास्थ्य और कुछ हद तक उनका भविष्य भी बनता है। ऐसे में देश में बच्चों के बढ़ते मोटापे को लेकर सरकार की चिंता स्वाभाविक है। स्कूलों में बच्चों के खाद्य व पेय पदार्थों के लिए कैलोरी, शुगर और नमक की मात्रा तय करने का फैसला नियंत्रण का कदम ही नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली के बीच बचपन को सेहतमंद रखने की कोशिश भी है।
यह नियंत्रण जरूरी भी हो गया है क्योंकि आज पिज्जा, बर्गर, मीठे पेय और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ बच्चों की पसंद बन चुके हैं। स्वाद के आकर्षण के पीछे छिपी अतिरिक्त कैलोरी, शुगर और नमक का असर शरीर पर धीरे-धीरे दिखाई देता है। मोटापा आगे चलकर मधुमेह, हृदय रोग और दूसरी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का कारण बन सकता है। नए नियमों में पहली बार कैलोरी, शुगर और नमक की मात्रा के लिए स्पष्ट सीमा तय की गई है। अभी तक केवल हाई कैलोरी और हाई शुगर वाले खाद्य पदार्थों से बचने की बात होती थी, लेकिन कोई स्पष्ट सीमा नहीं थी। नए नियमों के बाद कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा। सच यह भी है कि केवल नियम बना देने से बच्चों की थाली नहीं बदलेगी। असली चुनौती निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन की है। देश के करीब 24.69 करोड़ बच्चों को इस दायरे में लाना आसान नहीं है। निजी, सरकारी और अद्र्धसरकारी स्कूलों में निगरानी की व्यवस्था अलग-अलग स्तर की है। इसलिए स्कूल कैंटीन की नियमित जांच, खाद्य पदार्थों की स्पष्ट लेबलिंग और नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी दंड व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। बच्चों को केवल यह कहकर नहीं रोका जा सकता कि पिज्जा मत खाओ या बर्गर मत खाओ। उन्हें इनके स्वस्थ विकल्प भी देने होंगे। स्कूल कैंटीन में फल, अंकुरित अनाज, पौष्टिक नाश्ता, दूध, छाछ और स्थानीय अनाज से बने खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराए जा सकते हैं। बाजरा, ज्वार और मूंग जैसे स्थानीय विकल्पों से भी स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। यानी जंक फूड हटाने के साथ-साथ स्वस्थ भोजन को भी बच्चों के लिए आकर्षक बनाना होगा। इस मामले में माता-पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों को पोषण के प्रति जागरूक करने के साथ सही भोजन के महत्व के बारे में भी बताना होगा।
सरकार का यह फैसला तभी कारगर होगा, जब यह भोजन की संस्कृति बदलने का अभियान बने। बचपन को बाजार के स्वाद के हवाले नहीं किया जा सकता। स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि स्वस्थ नागरिक तैयार करने की प्रयोगशाला भी है। स्कूल की कैंटीन में बिकने वाला हर निवाला दरअसल आने वाली पीढ़ी की सेहत में निवेश है। जरूरी है कि हम बच्चों को जंक फूड की आदत नहीं, बल्कि अच्छे भोजन की संस्कृति दें।
Updated on:
13 Aug 2026 04:29 pm
Published on:
13 Aug 2026 04:29 pm
