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युवाओं के आक्रोश की लहर देश के शिक्षा मंत्री की कुर्सी ले गई। पर बड़ा सवाल है, अब आगे क्या? भारत जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, दुनिया उसे ईष्र्या से देखती है और उसके अपने स्नातक दर्शक दीर्घा से। इंजन खराब हो तो ड्राइवर बदलने से कुछ नहीं होता। यह मंत्री पर गुस्सा नहीं था, बल्कि उस वादे पर चढ़ता चक्रवृद्धि ब्याज था, जिसे अर्थव्यवस्था ने चुकाना बंद कर दिया। वादा था कि पढ़ोगे और सब ठीक-ठीक करोगे तो आखिर में एक नौकरी इंतजार करेगी।
नेताओं और नौकरशाहों को यह आंकड़ा रोज देखना चाहिए। 2004 से 2023 तक भारत हर साल करीब 50 लाख ग्रेजुएट वर्कफोर्स में जोड़ता रहा, लेकिन नौकरी लगभग 28 लाख को ही दे पाया। अकुशलों को छोडि़ए, डिग्रीधारी भी बेकार हैं। आर्थिक सर्वेक्षण और नमक छिडक़ता है, मुश्किल से 8.25 प्रतिशत स्नातकों के पास योग्यता से मेल खाती नौकरी है, जबकि आधे से ज्यादा ऐसे काम में हैं, जो कोई 10वीं-12वीं पास व्यक्ति भी कर सकता है।
हम युवाओं को जनसांख्यिकीय लाभांश, यानी डेमोग्राफिक डिविडेंड कहते हैं। इस स्थिति में यह देनदारी हो चुकी है, जिसकी किश्त ऐसी है कि हर साल 70-80 लाख नए लोग नौकरी मांगेंगे। कहानी मांग और पूर्ति की ही है। रोजगार के अवसर, सरकारी, गैर-सरकारी, स्व-रोजगार, गिग और स्टार्टअप, मांग बनाते हैं और युवाओं की योग्यता, टैलेंट तथा जज्बा पूर्ति।
डिग्री और कौशल के बीच बढ़ती खाई
आज के विश्वविद्यालय पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते डिग्री कारखाने बन चुके हैं। रटंत विद्या, परीक्षा का नाटक और शिक्षा के लिबास में डिग्रीवाद। वे ऐसा कागज बांट रहे हैं, जिसे आज के एआइ युग में स्टार्टअप और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर अब काबिलियत का सबूत मानते ही नहीं। कौशल का पूरा तंत्र खुद से ही बॉक्सिंग कर रहा है। स्किल इंडिया, पीएमकेवीवाई और उनकी सगी-संबंधी योजनाएं ‘सर्टिफिकेट-गिनाऊ मॉडल’ भर हैं। युवा फाइल में लाइन आइटम बनकर गिने गए, प्रमाणपत्र बंटे, फंड क्लेम हुए, लेकिन प्लेसमेंट किसी ने नहीं देखा। इस नाकामी का सबसे बड़ा सबूत यह है कि करीब दस राज्य अब बेरोजगार स्नातकों को सीधे नकद यानी बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं। सरकार ने नौकरी पैदा करने का दावा छोड़ दिया है और युवाओं को सम्मान के साथ बेरोजगार बने रहने के लिए पैसे देने लगी है। तो अब आगे क्या? इस संकट को हल करने के लिए नारों की नहीं, ठोस उपायों की जरूरत है।
विश्वविद्यालयों की फंडिंग बदले
पहला, विश्वविद्यालयों में आउटकम-आधारित फंडिंग। यूजीसी और एआईसीटीई को सिर्फ नामांकन और इमारतों के आधार पर फंडिंग देना बंद करना होगा। संस्थागत अनुदान का 30 प्रतिशत हिस्सा सीधे सत्यापित आजीविका-परिणामों, जैसे प्लेसमेंट, अप्रेंटिसशिप या पूर्व छात्रों के जीएसटी-पंजीकृत उद्यमों आदि से जोड़ा जाना चाहिए। डिग्री कारखानों की बैलेंस शीट पर चोट कीजिए, पाठ्यक्रम सुबह तक खुद सुधर जाएगा।
एमएसएमई बनें रोजगार का आधार
दूसरा उपाय, एमएसएमई अप्रेंटिसशिप। ‘उद्योग की साझेदारी’ का मतलब सिर्फ टाटा या इंफोसिस नहीं हो सकता। कॉर्पोरेट इंडिया 80 लाख युवाओं को नहीं सोख सकता। हमारा असली निशाना भारत की 8 करोड़ एमएसएमई हैं। सरकार को चाहिए कि भ्रष्ट स्किलिंग सेंटरों को बायपास करके पैसा सीधे स्थानीय लघु उद्योगों को दे। एक या दो युवाओं को ‘अप्रेंटिस’रखने के बदले उन्हें वेतन सब्सिडी या टैक्स रिबेट मिले। अगर हर दसवीं इकाई भी ऐसा करे तो रातों-रात 80 लाख व्यावहारिक प्रशिक्षण सीटें तैयार हो जाएंगी।
भर्ती और उद्यमिता को मिले प्रोत्साहन
फिर आता है रोजगार-आधारित प्रोत्साहन। राजनीतिक नकद हस्तांतरण को बदलना होगा। स्नातकों को खाली बैठने के लिए पैसा देने के बजाय नियोक्ताओं और उद्यमों को पहली भर्ती का जोखिम उठाने के लिए पैसा दीजिए। एक नई योजना, ‘नेशनल एम्प्लॉयमेंट एंट्री वाउचर’ हो सकती है, जो फ्रेशर को काम पर रखने वाली कंपनी को उसके पहले साल के वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा वापस दे।
चौथा, कैश-फ्लो आधारित लोन। युवाओं से ‘नौकरी देने वाले बनें’ कहना बंद कर दीजिए, अगर बैंक लोन के लिए दादा की जमीन गिरवी रखनी पड़े। युवा उद्यमियों के लिए अड़चन महत्वाकांक्षा नहीं, पूंजी है। इसका जवाब है भरोसे पर टिकी माइक्रो-फाइनेंसिंग।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (यूपीआइ/अकाउंट एग्रीगेटर) का इस्तेमाल कर युवाओं के माइक्रो-उद्यमों को उनके कैश-फ्लो के आधार पर बिना गारंटी तुरंत वर्किंग कैपिटल मिलनी चाहिए। साख इस बात से नापी जाए कि आप क्या कर सकते हैं, इस बात से नहीं कि आपके परिवार के पास क्या है।
युवा उद्यमियों को बाजार में जगह
साथ ही, सरकार और कॉर्पोरेट को अपनी वार्षिक खरीद यानी प्रोक्योरमेंट का एक तय हिस्सा पहली पीढ़ी और युवाओं द्वारा चलाए जा रहे उद्यमों के लिए आरक्षित करना चाहिए।
और आखिरी उपाय, बाजार से मोनोपोली को तोडऩा है। यह जमीनी इनोवेशन और उद्यमिता का गला घोंटता है तथा रोजगार के अवसर आधे से भी कम कर देता है। जिस बाजार में गिनती के दो-तीन विक्रेता हों, वह बाजार नहीं, जमींदारी है और जमींदारी रोजगार नहीं देती, किरायेदार बनाती है। एकाधिकार आसमान से नहीं टपकता, वह नीति की गोद में पलता है। इसलिए टेंडर छोटे हिस्सों में तोडि़ए, अनुपालन का बोझ आकार के हिसाब से तय कीजिए और लागत से नीचे बेचने पर कार्रवाई मातम के बाद नहीं, उससे पहले हो।
इंजन ठीक करने की जरूरत
मंत्री रूपी ‘ड्राइवर’ बदलने से महज फौरी राजनीतिक शांति मिल सकती है, लेकिन युवाओं के रोजगार संकट को सुलझाने के लिए शिक्षा और अर्थव्यवस्था के मूल ‘इंजन’ को ठीक करना ही होगा।
Updated on:
13 Aug 2026 07:23 pm
Published on:
13 Aug 2026 06:17 pm
