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55 साल पहले Apollo-11 ने चांद पर छोड़ा था ये उपकरण, आज भी कर रहा काम

Apollo 11 के अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा की सतह पर 100 क्वार्ट्ज ग्लास प्रिज्म वाला एक पैनल रखा था। अपोलो 14 और 15 मिशन द्वारा छोड़े गए इसी तरह के प्रिज्मों के साथ यह पैनल पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाने में सहायक रहा है।

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Apollo 11

55 साल पहले 16 जुलाई को अपोलो 11 (Apollo 11) ने चंद्रमा की ओर अपनी ऐतिहासिक यात्रा शुरू की थी। कुछ दिनों बाद चालक दल का यह विमान नील आर्मस्ट्रांग (Neil Armstrong), बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स को लेकर चंद्रमा पहुंच गया था। 20 जुलाई 1969 को सबसे पहले चांद की धरती पर आर्मस्ट्रांग ने कदम रखा और बाद में एल्ड्रिन ने। वहीं, 24 जुलाई 1969 को यह दल धरती पर वापस पहुंच गया। चंद्र सतह पर उन्होंने कई प्रयोग किए, चंद्र चट्टानों और मिट्टी को इकट्ठा किया और अमरीकी राष्ट्रपति से टेलीफोन पर बात की, लेकिन वे चंद्रमा (Moon) पर कुछ ऐसा भी छोड़ गए, जो इतने वर्ष बाद न केवल अभी भी काम कर रहा है बल्कि महत्वपूर्ण जानकारियां भी दे रहा है। परावर्तक प्रिज्मों की एक ऐसी श्रृंखला जिसे मून लेजर रेंजिंग एक्सपेरिमेंट (Moon Laser Ranging Experiment) के रूप में जाना जाता है।

सरल उपकरण साबित हुआ बहुत कारगर

Apollo 11 अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा की सतह पर 100 क्वार्ट्ज ग्लास प्रिज्म वाला एक पैनल रखा था। अपोलो 14 और 15 मिशन द्वारा छोड़े गए इसी तरह के प्रिज्मों के साथ यह पैनल पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाने में सहायक रहा है। यह उपकरण बहुत ही सरल है। किसी भी बिजली स्रोत की आवश्यकता नहीं होने के कारण, प्रिज्म पृथ्वी-आधारित वेधशालाओं से भेजे गए लेजर पल्स को परावर्तित करते हैं। प्रकाश को वापस लौटने में लगने वाले समय को मापकर, वैज्ञानिक मिलीमीटर-स्तर की सटीकता के साथ चंद्रमा की दूरी की गणना कर सकते हैं।

धरती से कितना दूर खिसक रहा चंद्रमा

इस प्रयोग से कई वैज्ञानिक जानकारियां मिली हैं। इससे पता चला है कि चंद्रमा धीरे-धीरे पृथ्वी से 1.5 इंच (3.8 सेंटीमीटर) प्रति वर्ष की दर से दूर जा रहा है। आंकड़ों से यह भी पुष्टि हुई है कि चंद्रमा का कोर तरल है, जो दो दशक पहले की गई एक आश्चर्यजनक खोज थी। इसके अलावा, चंद्र लेजर रेंजिंग प्रयोग ने वैज्ञानिकों को आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का परीक्षण करने और चंद्रमा की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने की अनुमति दी है। इसने पृथ्वी के घूमने और उसके ध्रुवों की गति को समझने में भी हमारी मदद की है।

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