Charter: दावोस में ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' का आधिकारिक आगाज कर गाजा के पुनर्निर्माण का खाका पेश किया है। पाकिस्तान और तुर्की की इस बोर्ड में मौजूदगी ने भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है।
Diplomacy: स्विट्जरलैंड की बर्फीली पहाड़ियों के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को एक बार फिर चौंका दिया है। गुरुवार को उन्होंने 'बोर्ड ऑफ पीस' (Trump Board of Peace Davos) का चार्टर पेश किया, जिसे वे गाजा युद्ध के समाधान (Gaza Peace Charter Signing) और भविष्य में वैश्विक संघर्ष रोकने का सबसे बड़ा माध्यम बता रहे हैं। इस समारोह में अर्जेंटीना, पाकिस्तान, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यह पीस बोर्ड ट्रंप की 20-सूत्री गाजा शांति योजना का दूसरा चरण है। इसका प्राथमिक उद्देश्य युद्ध से तबाह हुए गाजा का पुनर्निर्माण करना, वहां के शासन को संभालना और क्षेत्र को विसैन्यीकृत (Demilitarised) करना है। ट्रंप ने दावा किया है कि यह संस्था संयुक्त राष्ट्र (UN) के विकल्प के रूप में उभर सकती है, क्योंकि यह "सिर्फ बातों के बजाय ठोस निवेश और कार्रवाई" पर यकीन करती है।
प्रमुख सदस्य: इसमें मार्को रुबियो, जेरेड कुशनर, टोनी ब्लेयर और वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे नाम शामिल हैं।
शर्त: स्थायी सदस्यता के लिए देशों को 1 बिलियन डॉलर (करीब 8300 करोड़ रुपये) का योगदान देने का प्रावधान रखा गया है।
ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का औपचारिक न्योता भेजा है। हालांकि, भारत ने अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। भारत के लिए यह स्थिति "इधर कुआं, उधर खाई" जैसी है।
इस बोर्ड में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन को प्रमुखता मिलना भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत को आशंका है कि कहीं यह देश इस मंच का इस्तेमाल कश्मीर जैसे द्विपक्षीय मुद्दे उठाने के लिए न करें।
भारत हमेशा से बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र (UN) के ढांचे का समर्थन करता आया है। ट्रंप का यह बोर्ड यूएन की भूमिका को सीमित कर सकता है, जो भारत की पारंपरिक विदेश नीति के खिलाफ है।
भारत गाजा में 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' का पक्षधर है। ट्रंप की योजना में फिलिस्तीन की राजनीतिक संप्रभुता से ज्यादा वहां के 'रियल एस्टेट' और व्यापारिक विकास पर जोर है, जो भारत की कूटनीतिक लाइन से अलग हो सकता है।
बहरहाल, भारत इस समय "रुको और देखो" की नीति अपना रहा है। विदेश मंत्रालय इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या बिना औपचारिक सदस्य बने मानवीय सहायता के जरिए इस प्रक्रिया में शामिल रहा जा सकता है। जानकारों का मानना है कि भारत ट्रंप जैसे करीबी सहयोगी को पूरी तरह नाराज नहीं करना चाहता, लेकिन अपनी स्वायत्तता से समझौता करना भी उसके लिए संभव नहीं है।