
Board of Peace :टैरिफ मुद्दे पर भारत के साथ रिश्तों में कड़वाहट के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में जारी संघर्ष खत्म करने के लिए बनाए गए हाई-प्रोफाइल 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) में शामिल होने के लिए दूसरे देशों के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी न्योता दिया है। यह खबर न केवल कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि इसने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत अब मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ा मध्यस्थ बन कर उभरेगा। जानिए इस महाशक्तिशाली बोर्ड में भारत की भूमिका और $1 बिलियन के योगदान की सच्चाई।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने 20-सूत्रीय पीस रोडमैप के तहत एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी समिति बनाने का सुझाव दिया है। यह बोर्ड गाजा में युद्धविराम लागू करवाने, मानवीय सहायता सुनिश्चित करने और युद्ध के बाद गाजा के पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा। खास बात यह है कि ट्रंप ने इस बोर्ड के लिए दुनिया के उन चुनिंदा नेताओं को चुना है, जिनका प्रभाव दोनों पक्षों (इज़राइल और अरब देशों) पर समान रूप से है। भारत के अलावा इस सूची में रूस के राष्ट्रपति पुतिन और पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ का नाम भी शामिल है।
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस प्रस्ताव पर बेहद सधा हुआ रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के विजन की सराहना करते हुए इसे "स्थायी शांति का मार्ग" बताया है। भारत की नीति हमेशा से 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' की रही है, जहां इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों शांति से रह सकें।
भारतीय विदेश मंत्रालय इस समय इस न्योते के तकनीकी पहलुओं की जांच कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, भारत इस बोर्ड में शामिल होने के लिए तैयार है, लेकिन वह अपनी शर्तों और निष्पक्षता पर कोई समझौता नहीं करना चाहता। भारत का मानना है कि केवल सैन्य समाधान से शांति नहीं आ सकती, इसके लिए आर्थिक निवेश और भरोसे की जरूरत है।
ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत खुद को विकासशील देशों (Global South) के नेता के रूप में देखता है। इस बोर्ड में शामिल होकर भारत अरब देशों और पश्चिमी देशों के बीच एक पुल का काम कर सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया से भारत का तेल और गैस आयात जुड़ा है। वहां शांति रहने से भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिलती है।
पुनर्निर्माण में अवसर: गाजा के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर का निवेश होगा। भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए यह एक बड़ा मौका साबित हो सकता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञ: विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का मोदी को बुलाना यह दर्शाता है कि अमेरिका अब भारत को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं देखता, बल्कि उसे एक वैश्विक 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' मानता है।
विपक्ष का नजरिया: भारत में विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को इस बोर्ड में शामिल होते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत की गुटनिरपेक्ष (Non-aligned) छवि प्रभावित न हो।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: इज़राइल ने भारत की संभावित भागीदारी का स्वागत किया है, जबकि कई अरब देशों ने भी मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर जल्द ही अमेरिकी विदेश मंत्री से इस विषय पर विस्तार से चर्चा कर सकते हैं।
बजट और फंड: क्या भारत इस शांति मिशन के लिए वित्तीय योगदान देगा? 'बोर्ड ऑफ पीस' के सदस्यों के लिए योगदान की चर्चाएं तेज हैं, जिस पर भारत सरकार को अंतिम फैसला लेना है।
पुतिन और मोदी: अगर पुतिन भी इस बोर्ड में शामिल होते हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यूक्रेन युद्ध के बीच भारत, अमेरिका और रूस एक ही टेबल पर कैसे बैठते हैं।
पाकिस्तान का फैक्टर: ट्रंप ने पाकिस्तान को भी न्योता दिया है। यदि भारत और पाकिस्तान दोनों एक ही शांति बोर्ड का हिस्सा बनते हैं, तो क्या इससे दोनों देशों के बीच जमे हुए रिश्तों की बर्फ पिघलेगी? यह इस पूरी खबर का एक रोचक और अनकहा पहलू है।
अजय बंगा की भूमिका: विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा भी इस बोर्ड के सदस्य हैं। यह दिखाता है कि इस शांति योजना का बड़ा हिस्सा 'इकोनॉमिक डिप्लोमेसी' पर आधारित है, न कि केवल सैन्य रणनीति पर।
Updated on:
19 Jan 2026 06:33 pm
Published on:
19 Jan 2026 06:29 pm
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