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दुश्मन की जमीन, ऊपर से इनाम का खौफ, ईरान में लापता अमेरिकी पायलट के लिए जिंदगी और मौत की रेस

ईरानी हमले में अमेरिकी विमान हुआ क्रैश हमले एक क्रू लापता हो गया। ईरान ने पायलट पर इनाम रखा है, वहीं अमेरिकी सेना अपने साथी को बचाने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है।

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Apr 04, 2026
ईरान में हमला। (फोटो- The Washington Post)

नई दिल्ली। ईरान ने शनिवार को अमेरिकी एफ-15ई लड़ाकू विमान को मार गिराया और यह 28 फरवरी से जारी संघर्ष में पहली बार है जब किसी अमेरिकी विमान को ईरानी क्षेत्र में नुकसान हुआ। इस विमान में दो सदस्यीय क्रू था जिसमें से एक को अमेरिकी बलों ने सुरक्षित निकाल लिया है। दूसरा सदस्य अब भी लापता है और उसकी तलाश जारी है। घटना के तुरंत बाद ईरान ने स्थानीय लोगों से अपील कर लापता पायलट को पकड़ने पर इनाम देने की घोषणा की। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच क्रू सदस्य तक पहले पहुंचने की होड़ शुरू हो गई है।

दुश्मन पायलट के लिए इनाम की घोषणा

ईरानी मीडिया ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति दुश्मन पायलट को जिंदा पकड़कर सुरक्षा बलों को सौंपेगा उसे इनाम दिया जाएगा। इस अपील के बाद इलाके में खोज अभियान तेज हो गया है। दूसरी ओर अमेरिकी सेना भी अपने लापता सदस्य को सुरक्षित निकालने के लिए तेजी से अभियान चला रही है। इस तरह दोनों देशों के बीच जमीन पर एक तरह की प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन गई है। पहले बचाए गए सदस्य को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है और उससे पूछताछ भी की जा रही है।

444 दिनों का वो खौफनाक मंजर

यह पहली बार नहीं है जब ईरान ने अमेरिकी कर्मियों को हिरासत में लिया हो। 4 नवंबर 1979 को तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 66 अमेरिकियों को बंधक बनाया गया था। इनमें से 52 लोगों को 444 दिन तक कैद में रखा गया और 20 जनवरी 1981 को रिहा किया गया। इसके अलावा 12 जनवरी 2016 को अमेरिकी नौसेना के 10 जवान गलती से ईरानी जलक्षेत्र में पहुंच गए थे। उन्हें हथियारों के बल पर पकड़ा गया, आंखों पर पट्टी बांधी गई और पूछताछ के बाद 15 घंटे में छोड़ दिया गया।

आंखों पर पट्टी, दिलों में खौफ

ईरान द्वारा विदेशी सैनिकों को हिरासत में लेने की घटनाएं केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। मार्च 2007 में ईरान ने 15 ब्रिटिश नौसैनिकों को पकड़ा था जब वे फारस की खाड़ी में निरीक्षण कर रहे थे। ईरान ने दावा किया कि वे उसके जलक्षेत्र में थे जबकि ब्रिटेन ने इसे खारिज किया। इससे पहले 2004 में भी आठ ब्रिटिश सैनिकों को तीन दिन तक हिरासत में रखा गया था। इन घटनाओं में सैनिकों को पूछताछ के दौरान कैमरे पर बयान देने के लिए मजबूर किया गया था।

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