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होली की मिठास में घुला फूहड़ता का जहर, अब गांवों में नहीं बैठती चौपाल, न ही होता है पारंपरिक फगुआ

- देखते ही देखते बदल गए होली के मायने, फूहड़ता होली के रंग में डाल रही है भंग- पहले दुश्मनों को भी दोस्त बना देती थी होली, अब बनी दुश्मनी निकालने का जरिया

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होली की मिठास में घुला फूहड़ता का जहर, अब गांवों में नहीं बैठती चैपाल, न ही होता है पारंपरिक फगुआ

Holi 2020

आजमगढ़. एक दौर था जब हर कोई फागुन मास आने का इंतजार करता था। बसंत पंचमी को होलिका का रेड़ गड़ते ही गांवों में चैपाल लगनी शुरू हो जाती थी और घर-घर फगुआ होता था। फगुआ गीतों की मिठास और युवाओं का अल्हड़पन भरा अंदाज और मस्ती बड़े-बड़े दुश्मनों को भी दोस्त बना देती थी लेकिन आज समय के साथ होली के मायने भी बदल गए हैं। होली के रंग में अश्लीलता और फूहड़ता की मिलावट ने इसे बदरंग कर दिया है। इससे लोकपर्व का उमंग और उत्साह फीका नजर आने लगा है। अब यह दोस्त को भी दुश्मन बनाने लगी है। चैपाल की परम्परा और फगुआ गीत भी अपना अस्तित्व खो चुके हैं। बड़ा वर्ग इसे संस्कृति और परंपरा के अंत के रूप में देख रहा है।

किसी को ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है अभी नब्बे के दशक में देखें तो लोग परंपरा का बाखूबी निर्वहन करते हैं। बसंत पंचमी की रात पूरा गांव मिलकर होलिका का रेड़ गाड़ता था और चैपाल का सिलसिला शुरू हो जाता था। हर दिन किसी न किसी के घर चैपाल पर लगती थी। गीत भी ऐसे जो दिल में उतर जाते थे। ठेठ गंवई भाषा में कहा जाता है कि ‘फागुन में बुढऊ भी जवान हो जाते है। बच्चों और युवाओं का उत्साह तो देखते ही बनता था।

उस दौर में चैपालों में गाए जाने वाले परंपरिक फगुआ गीत ‘बसवरिया से कागा उड़ भागा मोरा सइया अभागा न जागा‘ ‘होली खेलय रघुवीरा अवध में, होली रघुवीर‘ ‘छलिया का वेश बनाया, श्याम होली खेलने आए‘, ‘कजरहिया रे कजरहिया, कजरहिया की आई बहार नई बहु खोल डबे से काजरा‘, ‘धनश्याम घरे नहीं आयो फगुनवा बितायो‘, ‘सिया कवन हरे लिए जाए बिना हो रघुराई‘, ‘बृज करत विहार श्याम राधिका दूनो जने‘, ‘जोबना रस कागा ले भागा मोरा सइया अभागा न जागा‘ हमारी संस्कृति और परम्पराओं का एहसास कराते थे। तब फिल्मों में भी होली का गीत फिल्माते समय परम्पराओं और संस्कृति का पूरा ध्यान दिया जाता था। पुरानी फिल्मों के गीत ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली‘ ‘आज न छोड़ेगे हम हम जोली खेलेंगे तुम संग होली‘ ‘होली आई रे कन्हाई‘ दिल को छू लेते थे।

खतरे में पड़ा होली का अस्तित्व

बदलते दौर के साथ आज होली का मतलब हुडदंग हो गया है। गांवों में अब न तो चैपाल बैठती है और न ही होली धुरेड़ी के दिन घर-घर धूमकर फगुआ होता है। अब डीजे और कपड़ा फाड़ होली जिसे सही मायने में उपद्रव कहा जा सकता है। अश्लीलता के कारण तो अब होली का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। खासतौर पर फिल्मी अश्लीलता ने होली का मतलब ही बदल दिया है। ‘भतिजवा क माई जिंदाबाद‘, रंगवा गइल पेटीकोट में जैसे गीत इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। आज के समय में युवा वर्ग अपने परंपरा को भूल अंधाधुंध इनके पीछे भाग रहा है।

परम्पराओं को भूलती जा रही यूवा पीढ़ी

60 वर्षीय अमरजीत यादव, 67 वर्षीय नरेंद्र गुप्ता, 56 वर्षीय सतेंद्र सिंह आदि कहते है कि होली के त्योहार में हमारी प्रकृति की खूबसूरती दिखती है। पहले पारंपरिक गीतों के जरिए हम खुद को प्रकृति के करीब महसूस करते थे। गीतों के जरिए नई पीढ़ी अपनी परम्परा, संस्कृति को समझता था। लेकिन अब सब कुछ छूटता जा रहा है। यूवा पीढ़ी परम्पराओं को भूलती जा रही है लेकिन हमें अपने लोकपर्व को सहेजना होगा।

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