
गजराज के आगे दागे तोप के गोले
मैसूरु. दशहरा महोत्सव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही पारंपरिक पूजा विधानों की शुरूआत भी हो गई है। इस क्रम में बुधवार को महल परिसर में 150 साल पुराने सात ऐतिहासिक तोपों की पूजा की गई। पारंपरिक रूप से महोत्सव में तोप के गोले छोड़कर सलामी दी जाती है जिसका पूर्वाभ्यास शुरू करने के पहले तोपों की पूजा की परंपरा है।
महोत्सव के दौरान भारी शोर और तोपो के गोलों की आवाज एवं बारूद की गंध के प्रति हाथियों में अनुकूलता पैदा करने के लिए हाथियों के समक्ष तोप के गोले दागे जाते हैं। विजयदशमी के दिन जब महल परिसर में मुख्यमंत्री स्वर्ण हौदा में स्थापित देवी चामुंडेश्वरी को पुष्प अर्पित करते हैं उसके बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है। उसी दिन बन्नीमंटपा मैदान में टार्च लाइट परेड के दौरान भी तोपों की सलामी दी जाती है। सिटी सशस्त्र रिजर्व (सीएआर) बल के एसीपी सुरेश के नेतृत्व में मैसूरु महल बोर्ड से संबंधित तोपों से गोले छोड़े जाएंगे।
पारंपरिक पूजा के दौरान मैसूरु शहर पुलिस आयुक्त डॉ ए सुब्रमण्येश्वर राव, महल सुरक्षा के एसीपी शैलेन्द्र सहित सीएआर से संबंधित कई पुलिसकर्मी मौजूद थे। एक सप्ताह तक चलने वाले रिहर्सल प्रक्रिया में जम्बो सवारी की अगुवाई करने वाले हाथी अर्जुन सहित सभी 12 हाथियों के समक्ष गोले दागे जाएंगे। दशहरा हाथियों के चिकित्सा प्रभारी डॉ नागराज ने कहा कि पूर्वाभ्यास का यह अहम हिस्सा है और सभी हाथियों को इसके अनुकूल ढालने के लिए उनके सामने तोप के गोले दागे जाएंगे।
गोले दागने का शाही इतिहास
दशहरे पर तोप के गोले दागने का शाही इतिहास है। जब मैसूरु राजपरिवार के संचालन में महोत्सव होता था तब महाराजा इसलिए तोप के गोल दागते थे ताकि वहां की प्रजा को पता चल सके कि शुभ अवसर की शुरूआत हो चुकी है। न सिर्फ दशहरा बल्कि अन्य शुभ अवसरों के दौरान भी गोले दागने
की परंपरा थी।
Published on:
21 Sept 2018 07:06 pm
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