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कन्नड़ भाषा का अतीत गौरवशाली लेकिन भविष्य चिंताजनक

साहित्यकार चंद्रशेखर कम्बार बोले

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कन्नड़ भाषा का अतीत गौरवशाली लेकिन भविष्य चिंताजनक

बेंगलूरु. लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कन्नड़ भाषा का अतीत उज्ज्वल है लेकिन इसका भविष्य चिंताजनक दिखाई दे रहा है। इस विषय पर गंभीर चिंतन करना होगा। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक डॉ चंद्रशेखर कम्बार ने यह बात कही।

कर्नाटक गांधी स्मारक निधि भवन में गुरुवार को 63 वें कन्नड़ राज्योत्सव के अवसर पर सपना बुक हाउस की ओर से कन्नड़ भाषा का अतीत-वर्तमान तथा भविष्य विषय पर विचार संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा कि कन्नड़ भाषी इस भाषा के अतीत के वैभव का बहुत बड़ा भार लेकर चल रहे हैं लेकिन हमारे पास इस भाषा के भविष्य को लेकर कोई सपने नहीं हंै और हमें इस यह सत्य स्वीकार करना होगा।

हम हमारी भाषा संस्कृति की जड़ों से ही दूर होते जा रहे हैं। कर्नाटक में कन्नड़ भाषा की अनदेखी के कारण इस का अस्तित्व ही मिटने की आशंका है।

कन्नड़ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रो.एस.जे.सिद्धरामय्या ने कहा कि प्रशासन तथा निजी क्षेत्रों में कन्नड़ भाषा के उपयोग अनिवार्य करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहें है लेकिन जब ऐसा कोई फैसला किया जाता है तब ऐसे फैसले को अदालतों मे चुनौती दी जाती है।

कानून में ही सुधार की आवश्यकता है। कवि प्रो.के.एस.निसार अहमद ने कहा कि युवाओं के कन्नड़ भाषा की ताकत से अनभिज्ञ होने के कारण वे कन्नड़ माध्यम से पढ़ाई नहीं करना चाहते हैं।

हमें इस स्थिति को बदलने का संकल्प करना होगा। कार्यक्रम के दौरान राज्य के साहित्यकारों को सम्मानित किया गया।