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पाप कर्मों से बचते हुए मर्यादित जीवन जिएं श्रावक

जिसने अपने जीवन में कुछ न कुछ व्रत नियम अंगीकार किया वही सच्चा श्रावक है

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पाप कर्मों से बचते हुए मर्यादित जीवन जिएं श्रावक

बेंगलूरु. हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुप्रिया ने 'श्रावका चारÓ विषय पर कहा कि भगवान महावीर ने श्रावक के जीवन में भी मर्यादा बतलाई है, जिससे वह गृहस्थ जीवन की पालना करते हुए कैसे अपने लिए व्रतों को धारण करते हुए अनावश्यक पाप कर्मों से बचते हुए मर्यादित जीवन जी सके। श्रावक में आए तीन अक्षरों पर विवेचन करते हुए कहा कि प्रथम श्रा अक्षर से आश्य कि जो देव, गुरु, धर्म के प्रति सच्चा श्रद्धावान है। दूसरा अक्षर व अर्थात जो विवेकवान है, जो पाप पुण्य को जानता है।

तीसरा क अक्षर से आशय है जो क्रियावान है। जिसको जीव, अजीव, पुण्य पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष तत्त्व की जानकारी है वही श्रावक कहलाने का अधिकारी हुआ करता है। जिसने अपने जीवन में कुछ न कुछ व्रत नियम अंगीकार किया वही सच्चा श्रावक है। साध्वी सुविधि ने अरिहंत पद को पाना है भजन की प्रस्तुति दी। साध्वी सुमित्रा ने सागर चरित्र के वाचन के बाद सबको मंगलपाठ प्रदान किया। अहमदाबाद के मूलचंद नाहर ने भी विचार व्यक्त किए। अध्यक्ष हुकमीचंद काकरिया ने 34 उपवास की तपस्या मौनपूर्वक गतिमान है। संचालन सह मंत्री रोशनलाल बाफना ने किया।


सुख को छोड़ जो संयम ले वही धन्य
बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ, शांतिनगर में आचार्य महेंद्र सागर सूरी के सान्निध्य में बुधवार को संयम वंदना संवेदना का भावभीना कार्यक्रम संपन्न हुआ। अनुष्ठान में उपस्थित लोगों ने संयम जीवन की अनुमोदना के लिए कई प्रकार के लिए ग्रहण किए। आचार्य ने कहा कि वर्तमान समय मे संयमी बने बाल साधुओं और युवा साधुओं को देखकर यदि संयम त्याग के लिए भावपूर्वक वंदन और अनुमोद नहीं होता है तो वो जीव चारित्र मोहनीय कर्म के जटिल बंधन में फंसा है।

न जाने उस जीव को अभी और भी पांचवें आरे और छठे ओर में और उससे भी आगे पता नहीं कितने कालचक्र तप संसार में परिभ्रमण करते हुए कितने जन्म मरण होंगे। इस भौतिक युग के सुख साधनों को छोड़ जो संयम लेते हैं वे तो धन्य है, किंतु जिन्हें उनके दर्शन वंदन का लाभ होता है वे भी धन्य हैं।