सफलता नहीं संतुष्टि हो लक्ष्य
बेंगलूरु. बिना लिबास आए थे इस जहां में, बस एक कफन की खातिर इतना सफर करना पड़ा...। लोग क्या कुछ नहीं सीखते हैं। धन और सफलता के लिए क्या-क्या पैंतरे नहीं अपनाते हैं। लेकिन अंजाम तो अंत ही है। भविष्य में सुख पाने की अपेक्षा में वर्तमान को दुखी न करें। सफलता नहीं संतुष्टि हो जीवन का लक्ष्य।
यह कहना है प्रसन्ना ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी सुखबोधानंद का। सुराणा शिक्षण संस्थान की ओर से शनिवार को आयोजित पहले वार्षिक परिवर्तनकारी नेतृत्व शिखर सम्मेलन व पुरस्कार वितरण समारोह में उन्होंने कहा, पत्थर एक बार मंदिर पहुंचता है और भगवान बन जाता है। लेकिन इंसान बार-बार मंदिर जा पत्थर ही रह जा रहा है। भिखारी मंदिर के बाहर भीख मांगता है तो धनी व्यक्ति मंदिर के अंदर खुशी से काम करेंगे तो सफलता के साथ खुशी और संतुष्टी भी मिलेगी। हर परिस्थिति को नई और सकारात्मक मनोस्थिति से देखने की जरूरत है।
ट्रांस-डिसिप्लीनरी यूनिवर्सिटी के कुलपति पद्मश्री दर्शन शंकर ने कहा, उच्चतर शिक्षण संस्थान सिर्फ डिग्रीधारियों की फौज खड़े कर रहे हैं जिनका एक मात्र मकसद निजी उन्नति यानी नौकरी हासिल करना है। ऐसे डिग्रीधारी समाज की जरूरत नहीं समझते, जिस कारण वे आविष्कार और बदलाव के कौशल से दूर हैं।
भारतीय विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. पी. बलराम व प्रधान अनुसंधान वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वर पी. अय्यर और जैन विवि के प्रो वाइस चांसलर डॉ. संदीप शास्त्री ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इससे पहले संस्थान की मैनेजिंग ट्रस्टी अर्चना सुराना ने सम्मेलन का उद्घाटन किया।
इन्हें मिला सम्मान
पहले ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप अवार्ड के तहत धर्मस्थला धर्माधिकारी पद्म विभूषण डॉ. वीरेन्द्र हेगड़े को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त पद्मश्री डॉ. एच सुदर्शन, पद्मश्री डा.ॅ दर्शन शंकर, पद्मश्री डॉ. सी. एन. मंजूनाथ, डॉ. अच्युत सामंत, डॉ. शतावदानी आर गणेश, डॉ. एस श्रीनिवास मूर्ति, डॉ. सोनाली पेंडनकर, डॉ. राजदीप मनवाणी, डॉ. माधुरी गोरे, डॉ. भावेश सिंदे, डॉ. शशि जैन, डॉ. राकेश शर्मा आदि को शिक्षा, चिकित्सा, समाजसेवा आदि क्षेत्रों में सराहनीय योगदान के लिए विविध श्रेणियों में सम्मानित किया गया।